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उत्तराखंड में बीजेपी की बड़ी रणनीति, 2027 के चुनाव से पहले नितिन नवीन के दौरे के सियासी मायने

उत्तराखंड में बीजेपी की बड़ी रणनीति, 2027 के चुनाव से पहले नितिन नवीन के दौरे के सियासी मायने

उत्तराखंड की राजनीति में सुगबुगाहट तेज हो चुकी है और इसकी सबसे बड़ी वजह है सत्ताधारी पार्टी का हाई-प्रोफाइल मूवमेंट। साल 2026 के इस दौर में आगामी विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट अभी से धरातल पर दिखने लगी है। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा महज एक औपचारिकता या सामान्य सांगठनिक बैठक नहीं था, बल्कि इसे राज्य की राजनीतिक बिसात पर एक बेहद सधा हुआ और दूरगामी कदम माना जा रहा है। हल्द्वानी से लेकर राज्य के विभिन्न कोनों तक फैले इस दौरे ने कई अहम संदेश दिए हैं, जो सीधे तौर पर आने वाले चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

संगठन की मजबूती और दो-तिहाई बहुमत का महा-संकल्प

दौरे के पहले दिन का पूरा फोकस पार्टी मशीनरी को कसने और जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने पर था। बंद कमरे में हुई बैठकों और खुलासेवार चर्चाओं का केंद्र बिंदु साल 2027 का विधानसभा चुनाव रहा। पार्टी हाईकमान की नजरें उत्तराखंड में एक बार फिर से इतिहास रचने पर टिकी हैं। भाजपा इस बार राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का बड़ा लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल करने की रणनीति बनाई जा रही है।

इन बैठकों में साफ निर्देश दिए गए कि बूथ स्तर पर निष्क्रियता के लिए कोई जगह नहीं होगी। कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय और आपसी तालमेल को बेहतर करने पर जोर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब चुनाव में अभी वक्त है, तब से ही केंद्रीय नेतृत्व का इस तरह मैराथन बैठकें करना इस बात का संकेत है कि पार्टी इस बार किसी भी तरह की आंतरिक कलह या सुस्ती को अपने विजय रथ में रुकावट नहीं बनने देना चाहती।

वीरभूमि और अध्यात्म का अनूठा संगम

दौरे के दूसरे दिन की शुरुआत पूरी तरह से वैचारिक और सांस्कृतिक गहराई के साथ हुई। महालक्ष्मी मंदिर में पूजा-अर्चना और आधुनिक उत्तराखंड के निर्माता कहे जाने वाले पंडित गोविंद बल्लभ पंत को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ दिन की शुरुआत हुई। लेकिन इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण पूर्व सैनिक सम्मेलन रहा।

उत्तराखंड को यूं ही 'देवभूमि' नहीं कहा जाता, बल्कि इसकी एक और मजबूत और अटूट पहचान 'वीरभूमि' के रूप में है। राज्य के कोने-कोने से ताल्लुक रखने वाले सैनिक परिवार और पूर्व सैनिक समाज का एक बड़ा वर्ग यहां की राजनीति और समाज को सीधे प्रभावित करता है। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय नेतृत्व ने 'वन रैंक वन पेंशन' (OROP), सेना के आधुनिकीकरण, और सीमांत गांवों के विकास जैसे मुद्दों को मुखरता से उठाया। प्रदेश नेतृत्व ने भी उत्तराखंड को 'पंचम धाम' यानी 'सैन्य धाम' की संज्ञा देकर यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी राष्ट्रवाद और सैनिक सम्मान के मुद्दे को अपनी राजनीतिक धुरी बनाए रखेगी।

पंजाबी गौरव और सिख समाज के साथ गहराता संवाद

इस दौरे का एक और महत्वपूर्ण पहलू पंजाबी गौरव सम्मेलन रहा, जिसने सियासी गलियारों में खासी चर्चा बटोरी। नानकमत्ता साहिब की पवित्र भूमि और सिख गुरुओं के महान बलिदान की परंपरा को याद करते हुए भाजपा ने एक बड़ा वैचारिक संदेश देने की कोशिश की। राष्ट्रीय नेतृत्व ने करतारपुर साहिब कॉरिडोर के खुलने का जिक्र करते हुए इसे ऐतिहासिक भूल सुधार करार दिया।

इसके साथ ही, सिख नरसंहार से जुड़े मामलों में एसआईटी के गठन, हेमकुंड साहिब के लिए रोप-वे परियोजना जैसी विकास योजनाओं और पंजाब समेत पूरे देश को नशामुक्त करने के संकल्प का उल्लेख कर पार्टी ने केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि एक बड़े क्षेत्रीय और धार्मिक वर्ग तक अपनी पहुंच का संदेश दिया। उत्तराखंड और पंजाब के बीच के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को टटोलते हुए भाजपा ने यह साबित करने का प्रयास किया कि उनका दायरा हर वर्ग और समुदाय को अपने साथ लेकर चलने का है।

युवा संवाद: भविष्य की राजनीति और रोजगार के मुद्दे पर सीधी बात

किसी भी राजनीतिक दल के लिए आज के दौर में युवा वर्ग सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में करियर, उद्यमिता, कौशल विकास और उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील मुद्दों जैसे पलायन और रोजगार पर खुलकर चर्चा हुई।

उत्तराखंड में रोजगार के अवसरों की कमी और पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार होने वाला पलायन हमेशा से विपक्षी दलों के तरकश का मुख्य तीर रहा है। ऐसे में, युवाओं के बीच जाकर उनकी उम्मीदों को सुनना और सरकारी योजनाओं को उनके भविष्य के साथ जोड़ना भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह नई पीढ़ी की राजनीतिक और सामाजिक उदासीनता को पाटना चाहती है। पार्टी की कोशिश है कि युवाओं को केवल मतदाता न मानकर, बल्कि संगठन की रीढ़ के रूप में खड़ा किया जाए।

विपक्ष की घेराबंदी और सियासी उठापटक

जाहिर है, सत्ताधारी दल की इस सक्रियता पर विपक्ष भला चुप कैसे बैठता। कांग्रेस पार्टी ने इस पूरे दौरे और मौजूदा सरकार के कामकाज पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भाजपा के भीतर कथित गुटबाजी को हवा देते हुए सरकार को महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और शिक्षा के क्षेत्र में विफलताओं के लिए घेरा। कांग्रेस का यह जवाबी नैरेटिव यह साबित करने के लिए काफी है कि 2027 का चुनावी रण आसान नहीं होने वाला है और हर मोर्चे पर तीखी टक्कर देखने को मिलेगी।

निष्कर्ष: जमीन पर कितनी उतरेगी रणनीति?

नितिन नवीन का यह दो दिवसीय दौरा विविधता से भरा हुआ था—मंदिर के दर्शन से लेकर शहीद सैनिकों का सम्मान, सिख समाज का गौरव गान और युवाओं के साथ भविष्य का मंथन। यह साफ दिखाता है कि भाजपा अपने चुनावी अभियान को केवल पारंपरिक राजनीतिक दायरे तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि समाज के हर छोटे-बड़े समूह को अपने साथ जोड़कर एक मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार करना चाहती है।

अब असली चुनौती यह है कि इन मंचों से दिए गए संदेशों और वादों को जमीनी हकीकत में कैसे बदला जाए। क्या बूथ स्तर का कार्यकर्ता पार्टी के इस विजन को आम जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचा पाएगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी फिजा में गर्मी अभी से घुल चुकी है और हर दल अपनी चालें बहुत ही सावधानी से चल रहा है।

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रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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