राजनीति में कार्यकर्ताओं और पूर्व सैनिकों की भूमिका पर कोटद्वार के एक पूर्व सैनिक महेंद्र का यह विचारणीय आलेख सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और स्वाभिमान पर पुनर्विचार करने का संदेश देता है।
सेना की नौकरी के दौरान अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिक जब सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कदम रखते हैं, तो उनके सामने कई नई चुनौतियां आती हैं। आलेख में एक प्रसिद्ध कहावत का जिक्र करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार बिल्ली चूहे को मुंह में दबाकर छत पर ले जाती है और चूहा यह समझता है कि वह ऊंचाई पर पहुंच रहा है, वैसी ही स्थिति आज के दौर में कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हो गई है।
राजनीतिक दलों को चुनाव के समय झंडा उठाने वाले, नारे लगाने वाले और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। कार्यकर्ता को लगता है कि पार्टी उसे आगे बढ़ा रही है, लेकिन वास्तविकता यह होती है कि उसका उपयोग केवल चुनाव जीतने तक सीमित रहता है। चुनाव संपन्न होने के बाद वही कार्यकर्ता नेताओं के आसपास नजर नहीं आते।
पूर्व सैनिकों के लिए विशेष संदेश
पूर्व सैनिकों के पास लंबा अनुभव, अनुशासन, ईमानदारी और समाज में एक विशिष्ट सम्मान होता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए उत्सुक रहते हैं। आलेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि राजनीतिक दलों के साथ जुड़ना गलत नहीं है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि उनका उपयोग समाज की भलाई के लिए हो रहा है या केवल किसी की राजनीतिक कुर्सी बचाने के लिए।
चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के नेता पूर्व सैनिकों का सम्मान करते हैं, उनकी बातें सुनते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं। परंतु चुनाव जीतने के बाद पूर्व सैनिकों की समस्याओं, युवाओं के रोजगार, सैनिक परिवारों की चिकित्सा सुविधाओं और शहीदों के परिवारों की जरूरतों को भुला दिया जाता है। ऐसे में पूर्व सैनिकों को सवाल पूछने का साहस दिखाना चाहिए।
सिद्धांतों और स्वाभिमान की रक्षा
लेखक का कहना है कि पूर्व सैनिक किसी भी राजनीतिक दल के अंध-समर्थक नहीं हैं। उनका सम्मान किसी पार्टी की कृपा से नहीं, बल्कि देश के लिए की गई उनकी सेवा से है। इसलिए किसी भी दल से जुड़ते समय अपनी सोच, स्वाभिमान और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहिए। जो नेता पूर्व सैनिकों की बात सुने, उनके अधिकारों के लिए कार्य करे और अपने वादों को पूरा करे, उसका समर्थन किया जाना चाहिए। वहीं, जो केवल इस्तेमाल करे, उससे सवाल भी पूछे जाने चाहिए।
कोटद्वार के स्थानीय मुद्दों का हवाला देते हुए आलेख में मेडिकल कॉलेज, देहरादून-लालढांग-कोटद्वार-रामनगर राज्य मार्ग जैसे मामलों का जिक्र किया गया है। साथ ही यह सवाल उठाया गया है कि तहसीलदार, कोतवाली, मेयर और विधायक के कार्यालयों के बाहर खड़े रहने वाले लोगों की बात कितनी बार सुनी गई।
अंत में यह संदेश दिया गया है कि पूर्व सैनिकों की असली ताकत किसी नेता के पीछे चलने में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर डटकर खड़े रहने में है। भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय समाज की जागरूक और मजबूत आवाज बनना ही 'पहले देश सेवा, अब समाज सेवा' के मूल मंत्र को सार्थक करता है।