सरकारी तंत्र में फाइलों का आगे न बढ़ना और विकास कार्यों का अटक जाना अक्सर आम जनता के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनता है। इसी प्रशासनिक सुस्ती को तोड़ने और जनता से जुड़े मामलों को गति देने के लिए अब शासन स्तर पर कड़े कदम उठाए जाने लगे हैं। हाल ही में सचिवालय में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान प्रशासनिक महकमे में उस समय हलचल तेज हो गई, जब मुख्य सचिव ने लंबित मामलों को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने साफ कर दिया कि जनता के विकास कार्यों और प्रशासनिक फाइलों को लटकाए रखने की प्रवृत्ति अब किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सचिवालय में हुई अहम समीक्षा बैठक
राजधानी देहरादून स्थित सचिवालय में मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई। इस बैठक का मुख्य एजेंडा विभिन्न जनपदों से जुड़े शासन स्तर पर लंबित पड़े मामलों की समीक्षा करना और उनका समयबद्ध समाधान निकालना था। बैठक में राज्य के तमाम वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, विभागाध्यक्ष और सभी जनपदों के जिलाधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या प्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहे। बैठक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि शासन और जिलों के बीच की दूरियों को कम करते हुए फाइलों के मूवमेंट को रफ्तार दी जाए।
पारंपरिक तौर पर प्रशासनिक बैठकों में सिर्फ आंकड़ों पर चर्चा होती है, लेकिन इस बार का तेवर बिल्कुल अलग था। मुख्य सचिव ने एक-एक करके जिलों में अटकी फाइलों का हिसाब मांगा और अधिकारियों को हिदायत दी कि वे अपनी कार्यशैली में सुधार लाएं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जिला स्तर और शासन स्तर के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए ताकि आम आदमी के जरूरी काम बिना किसी अनावश्यक रुकावट के पूरे हो सकें।
अनावश्यक देरी पर अधिकारियों को चेतावनी
समीक्षा बैठक के दौरान मुख्य सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा कि जनपद स्तर पर किसी भी प्रकरण के निस्तारण में बेवजह की देरी नहीं होनी चाहिए। कई बार ऐसा देखा जाता है कि छोटे-छोटे मामले भी विभागों के बीच आपसी समन्वय की कमी के कारण महीनों या वर्षों तक फाइलों में ही दबे रह जाते हैं। इस संस्कृति पर गहरी नाराजगी जताते हुए उन्होंने निर्देश दिए कि जिलाधिकारी सीधे तौर पर संबंधित विभागाध्यक्षों से संवाद करें। यदि किसी स्तर पर पेंच फंसता है, तो तुरंत विभागीय उच्चाधिकारियों से संपर्क कर उसका समाधान निकाला जाए।
विशेष तौर पर उन मामलों में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं जिनका सीधा ताल्लुक आम जनता के कल्याण और बुनियादी सुविधाओं से है। प्रशासनिक अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनके टेबल पर पड़ी एक फाइल किसी क्षेत्र के विकास को रोक सकती है या किसी जरूरतमंद की उम्मीदों पर पानी फेर सकती है।
विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे को मिली प्राथमिकता
राज्य के विकास की रफ्तार तेज करने के लिए बुनियादी ढांचा (Infrastructure) सबसे अहम कड़ी होता है। बैठक में इस बात पर विशेष फोकस किया गया कि सड़कों, पुलों, नए सरकारी भवनों और अन्य बड़े निर्माण कार्यों से जुड़े लंबित मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए।
- सड़क और पुल निर्माण: पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं में यदि भूमि अधिग्रहण या अन्य कोई प्रशासनिक अड़चन है, तो उसका तुरंत समाधान हो।
- भवन और अन्य परियोजनाएं: जनता की सुविधाओं के लिए प्रस्तावित भवनों के निर्माण में हो रही देरी के कारणों की समीक्षा की गई।
- विभागीय निर्णय: जिन मामलों में शासन स्तर पर नीतिगत निर्णय लिया जाना है, उनमें फाइलें आगे बढ़ाने के बजाय तुरंत पत्रावली पर अंतिम मुहर लगाई जाए।
इन दिशा-निर्देशों का मकसद साफ है कि राज्य में चल रहे तमाम विकास कार्यों को तय समयसीमा के भीतर पूरा किया जाए, ताकि लागत भी न बढ़े और जनता को समय पर सुविधाओं का लाभ मिल सके।
जिलाधिकारियों की बढ़ी जिम्मेदारी
इस पूरी प्रक्रिया में जिलाधिकारियों (DM) की भूमिका को सबसे अहम माना गया है। मुख्य सचिव ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने जिलों में लंबित मामलों की नियमित रूप से समीक्षा करें। सिर्फ कागजी बैठकों के बजाय मैदानी स्तर पर यह देखा जाए कि फाइलें कहां और क्यों अटकी हैं।
जिलाधिकारियों को यह अधिकार और जिम्मेदारी दी गई है कि वे विभागाध्यक्षों के साथ सीधा संवाद स्थापित करें। यदि किसी जिले में स्थानीय स्तर पर कोई समस्या आ रही है, तो शासन के स्तर पर उसका तत्काल समाधान करवाया जाए। इस व्यवस्था से जिलों में प्रशासनिक कसावट आने की पूरी उम्मीद है।
बैठक में प्रशासनिक दिग्गजों की रही मौजूदगी
इस उच्चस्तरीय मंथन में राज्य के लगभग सभी प्रमुख प्रशासनिक चेहरे मौजूद रहे। बैठक में प्रमुख सचिव एल. फैनाई, विशेष प्रमुख सचिव अमित सिन्हा, सचिव नितेश कुमार झा, डॉ. बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम, रविनाथ रमन, चंद्रेश कुमार यादव, बृजेश कुमार संत, डॉ. वी. षणमुगम, डॉ. आर. राजेश कुमार, विनय शंकर पाण्डेय, विनोद कुमार सुमन, ज्योति यादव, रणवीर सिंह चौहान, धीराज सिंह गर्ब्याल और राजेंद्र कुमार ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इसके अलावा विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते, कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत, गढ़वाल आयुक्त आनंद स्वरूप के साथ-साथ सभी जनपदों के जिलाधिकारी भी इस अहम बैठक का हिस्सा बने। इतने बड़े प्रशासनिक अमले की मौजूदगी यह दर्शाती है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर कितनी गंभीर है।
हर महीने के पहले मंगलवार को होती है समीक्षा
यह कोई पहली बार नहीं है जब इस तरह की समीक्षा की गई हो। प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए एक बेहतरीन पहल की गई है। इसके तहत प्रत्येक माह के प्रथम मंगलवार को जनपदों से संबंधित शासन स्तर पर लंबित प्रकरणों की समीक्षा के लिए विशेष बैठक आयोजित की जाती है। इस मंथन का असर भी अब जमीन पर दिखने लगा है। बैठक के दौरान कई जिलाधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि नियमित समीक्षा और सीधे संवाद के कारण वर्षों से लंबित पड़े कई जटिल मामलों का समाधान अब तेजी से होने लगा है।
बहरहाल, मुख्य सचिव के इन कड़े निर्देशों और हर महीने होने वाली इस हाई-लेवल मॉनिटरिंग से यह तो साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में सरकारी कामकाज की सुस्ती कम होगी और विकास कार्यों को एक नई गति मिलेगी। अब देखना यह है कि मैदानी स्तर के अधिकारी इस गति को कितनी तेजी से आगे बढ़ाते हैं।