भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का संदेश, ऋषिकुमारों ने अनुष्ठान में लिया हिस्सा
ऋषिकेश में विजयादशमी के पावन पर्व पर परमार्थ निकेतन में विशेष धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों ने वेदों, उपनिषदों, पुराणों और विभिन्न प्राचीन शास्त्रों का विधि-विधान के साथ पूजन किया। संस्थान के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती के पावन सान्निध्य में संपन्न हुए इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना तथा नई पीढ़ी को इससे जोड़ना रहा।
शास्त्र और शस्त्र पूजन को जीवन निर्माण से जोड़ने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में कहा कि गुरुकुलों में चली आ रही शास्त्र और शस्त्र पूजन की परंपरा को केवल एक कर्मकांड या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे हर व्यक्ति को अपने जीवन निर्माण की एक सतत प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाना जरूरी है। आज के दौर में नई पीढ़ी को अपनी मूल ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक उत्तरदायित्वों से अवगत कराना और जोड़ना बेहद आवश्यक हो गया है।
जीवन में विवेक और सदाचार का महत्व
भारतीय परंपरा का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे प्राचीन शास्त्र मनुष्य को जीवन को गहराई से समझने, अपने कर्तव्यों की सटीक पहचान करने तथा जीवन में सही और गलत के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेने का सही मार्ग दिखाते हैं। शास्त्र पूजन का वास्तविक और व्यावहारिक उद्देश्य ज्ञान के प्रति अगाध सम्मान रखना, सत्य के मार्ग पर चलने की प्रतिबद्धता और सदाचार को अपने दैनिक आचरण में अपनाना है।
भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अपने संदेश में यह भी कहा कि ज्ञान के माध्यम से विवेक की प्राप्ति होनी चाहिए, शक्ति का उपयोग सुरक्षा के लिए होना चाहिए और शिक्षा के जरिए समाज में अच्छे संस्कारों का विकास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक पर्व विजयादशमी पर भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने आचरण में पूरी तरह उतारकर ही इस पर्व के वास्तविक संदेश को सार्थक बनाया जा सकता है।