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बरेका में राजभाषा पखवाड़ा-2026: भारतीय भाषाओं और पुस्तकों पर हुआ मंथन

बरेका में राजभाषा पखवाड़ा-2026: भारतीय भाषाओं और पुस्तकों पर हुआ मंथन

वाराणसी का प्रतिष्ठित बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) इन दिनों केवल तकनीकी और उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक ऊर्जा का भी एक अनूठा केंद्र बना हुआ है। सितंबर 2026 के इस दौर में संस्थान के भीतर चल रहे राजभाषा पखवाड़ा-2026 के तहत एक ऐसा आयोजन देखने को मिला, जिसने आधुनिक कामकाजी माहौल में साहित्य और पुस्तकों के प्रति प्रेम को फिर से जीवंत कर दिया है। बुधवार को बरेका परिसर में 'भारतीय भाषा संगोष्ठी एवं पुस्तक विमर्श' का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें कर्मचारियों ने अपनी साहित्यिक प्राथमिकताओं और पठन अनुभवों को खुलकर साझा किया।

महाप्रबंधक आशुतोष पंत के मार्गदर्शन में हुआ आयोजन

इस अनूठी संगोष्ठी का आयोजन महाप्रबंधक आशुतोष पंत के कुशल दिशा-निर्देशन और मुख्य राजभाषा अधिकारी सह मुख्य यांत्रिक इंजीनियर (उत्पादन एवं विपणन) राम जन्म चौबे के नेतृत्व में किया गया। राजभाषा विभाग द्वारा रूपरेखा तैयार कर आयोजित किए गए इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य तकनीकी कार्यों में व्यस्त रहने वाले कर्मचारियों को भारतीय साहित्य से जोड़ना और उनके भीतर वैचारिक संवाद को बढ़ावा देना था।

कार्यक्रम के दौरान सभागार का माहौल पूरी तरह से बौद्धिक और ऊर्जावान नजर आया। विभिन्न विभागों से आए कर्मचारियों ने केवल शिरकत ही नहीं की, बल्कि मंच पर आकर अपनी पंसदीदा भारतीय भाषा की पुस्तकों पर बेबाक और गहरे विचार रखे।

पुस्तकों की विषयवस्तु और संदेश पर हुई व्यापक चर्चा

संगोष्ठी का सबसे आकर्षक हिस्सा वह सत्र रहा जिसमें प्रतिभागियों ने अलग-अलग भारतीय भाषाओं की किताबों की समीक्षा की और उनके मूल संदेश पर प्रकाश डाला। कर्मचारियों ने बताया कि कैसे एक अच्छी किताब इंसान के दृष्टिकोण को बदल सकती है और उसे जीवन की जटिलताओं से निपटने की नई दृष्टि दे सकती है।

  • साहित्यिक विविधता: संगोष्ठी में हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के उपन्यासों, कविताओं और वैचारिक ग्रंथों पर भी खुलकर चर्चा हुई।
  • अनुभवों का आदान-प्रदान: कर्मचारियों ने बताया कि पुस्तक पढ़ने से उनकी कार्यक्षमता और मानसिक शांति पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • ज्ञानवर्धक संवाद: वक्ताओं ने किताबों के माध्यम से मिलने वाले जीवन मूल्यों और ऐतिहासिक सीखों को श्रोताओं के सामने रखा।

इस दौरान एक खुले संवाद का माहौल बना, जहां हर किसी को अपनी बात रखने का अवसर मिला। यह सत्र केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का एक जीवंत मंच साबित हुआ।

पुस्तक-पठन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास

आज के डिजिटल युग में जहां लोग स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं, बरेका द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय माना जा रहा है। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य कर्मचारियों और उनके परिवारों के बीच पुस्तक-पठन (Book Reading Culture) की संस्कृति को फिर से प्रोत्साहित करना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आयोजनों से कर्मचारियों की मानसिक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वे अपने कार्यक्षेत्र में भी अधिक रचनात्मकता के साथ योगदान दे पाते हैं। भारतीय भाषाओं के साहित्य को सहेजने और उसे जन-जन तक पहुँचाने की दिशा में बरेका का यह प्रयास एक मिसाल पेश कर रहा है।

निर्णायक मंडल की भूमिका और सक्रिय सहभागिता

इस संगोष्ठी को एक प्रतिस्पर्धी और अनुशासित रूप देने के लिए बरेका के वरिष्ठ अधिकारियों ने निर्णायक की जिम्मेदारी संभाली। उप मुख्य विपणन प्रबंधक अनूप मिश्रा और उप वित्त सलाहकार तथा मुख्य लेखा अधिकारी अजय कुमार ने निर्णायक मंडल की भूमिका निभाते हुए सभी प्रतिभागियों के वक्तव्यों का बारीकी से मूल्यांकन किया।

कार्यक्रम में बरेका के विभिन्न विभागों से बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि तकनीकी और मशीनों के बीच जीने वाले रेलकर्मी साहित्य और कला के प्रति भी उतना ही गाढ़ा प्रेम रखते हैं।

निष्कर्ष और भविष्य की उम्मीदें

वाराणसी के इस प्रतिष्ठित कारखाने में आयोजित राजभाषा पखवाड़ा-2026 के अंतर्गत यह संगोष्ठी महज एक कार्यक्रम बनकर नहीं रह गई, बल्कि यह भाषा, संस्कृति और वैचारिक स्वतंत्रता का उत्सव बन गई। इस प्रकार के आयोजन न केवल दफ्तर के तनाव को कम करते हैं, बल्कि कर्मचारियों के व्यक्तिगत विकास में भी मील का पत्थर साबित होते हैं। बरेका प्रशासन के इस कदम ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि राष्ट्र निर्माण में केवल तकनीकी कौशल ही नहीं, बल्कि वैचारिक समृद्धि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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