बिहार के आरा शहर में स्थित प्रतिष्ठित वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय (VKSU) परिसर इन दिनों किसी तालाब में तब्दील नजर आ रहा है। आलम यह है कि महज कुछ घंटों की बारिश के बाद ही पूरा प्रशासनिक और शैक्षणिक परिसर पानी-पानी हो जाता है। सितंबर 2026 के इस दौर में भी यूनिवर्सिटी के हालात जस के तस बने हुए हैं, जिससे शिक्षा प्राप्त करने आने वाले छात्र-छात्राओं और अपनी ड्यूटी निभाने वाले कर्मचारियों का जीवन नारकीय बन गया है। परिसर में फैला यह जलजमाव न सिर्फ बुनियादी सुविधाओं की पोल खोल रहा है, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
हल्की बारिश और पसर जाता है जलजमाव का साम्राज्य
विश्वविद्यालय परिसर में जलनिकासी की कोई मुकम्मल व्यवस्था न होने के कारण यह समस्या लाइलाज बीमारी बनती जा रही है। हालात इतने बदतर हैं कि मानसून हो या फिर बेमौसम की हल्की बारिश, पानी की एक बूंद गिरते ही मुख्य मार्गों से लेकर कार्यालयों के दरवाजों तक जलजमाव हो जाता है। विद्यार्थियों को अपने जरूरी दस्तावेजों, डिग्री या रजिस्ट्रेशन के काम से आने के लिए गंदे पानी के बीच से गुजरना पड़ता है। कई बार तो छात्रों को घुटने भर पानी को पार करके यूनिवर्सिटी भवन तक पहुंचना पड़ता है। यही हाल शिक्षणेत्तर कर्मचारियों और अधिकारियों का भी है, जिन्हें अपने कार्यस्थलों तक पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है.
परिसर की इस दयनीय स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानों विकास के तमाम दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं। मुख्य प्रशासनिक भवन के सामने और गलियारों में जलभराव होने से पैदल चलना तो दूर, दोपहिया वाहनों का निकलना भी दूभर हो गया है। कई बार वाहन फिसलने से छात्र चोटिल भी हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है.
छात्रों का फूटा गुस्सा: आखिर कहां जा रहा है विकास का बजट?
विश्वविद्यालय के इस कृत्रिम संकट से त्रस्त होकर अब छात्र संगठन और आम छात्र-छात्राएं खुलकर विरोध पर उतर आए हैं। छात्रों का सीधा सवाल है कि जब सिंडिकेट और सीनेट की बैठकों में विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये के बजट को हरी झंडी दिखाई जाती है, तो वह भारी-भरकम राशि आखिर जा कहां रही है? यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी एक अदद नाले का निर्माण नहीं कराया जा सकता या पुराने ड्रेनेज सिस्टम को ठीक नहीं किया जा सकता, तो इस बजट का औचित्य ही क्या है?
"हम रोजाना पढ़ाई के लिए आते हैं, लेकिन यहां आकर ऐसा लगता है कि हम किसी जलमग्न इलाके में आ गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन को हमारी परेशानियों से कोई मतलब नहीं है। अगर जल्द ही जलजमाव का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो हम उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।" - एक पीड़ित छात्र
छात्रों का यह भी कहना है कि वे इस समस्या को लेकर कई बार मौखिक और लिखित शिकायतें कर चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन की घुट्टी पिला दी जाती है। जमीनी स्तर पर सुधार के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, जिससे यूनिवर्सिटी प्रशासन की उदासीनता साफ झलकती है.
कर्मचारियों की भी बढ़ी मुश्किलें, कामकाज हो रहा है प्रभावित
सिर्फ छात्र ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी भी इस समस्या से समान रूप से जूझ रहे हैं। दफ्तरों के चारों तरफ पानी भर जाने के कारण फाइलों का रख-रखाव और प्रशासनिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। गंदे पानी की वजह से परिसर में मच्छरों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों फैलने का खतरा मंडरा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि बदबू और गंदगी के बीच बैठकर काम करना बेहद कठिन हो गया है, लेकिन वे अपनी नौकरी की मजबूरी में रोजाना इस नरक से गुजरने को विवश हैं.
चाहिए स्थायी समाधान, सिर्फ लीपापोती से नहीं चलेगा काम
यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रबुद्ध नागरिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह की समस्याओं का तात्कालिक समाधान यानी केवल पंप लगाकर पानी निकाल देना काफी नहीं है। इसके लिए एक दीर्घकालिक और तकनीकी रूप से मजबूत मास्टर प्लान की जरूरत है। विश्वविद्यालय परिसर की टोपोग्राफी को ध्यान में रखते हुए पानी की निकासी के लिए भूमिगत ड्रेनेज पाइपलाइन बिछाई जानी चाहिए, ताकि बारिश का पानी बिना रुके सीधे मुख्य नाले तक पहुंच सके.
- मुख्य मार्ग और भवनों के पास तत्काल पंपिंग सेट की व्यवस्था हो।
- परिसर में जल निकासी के लिए नए और चौड़े नालों का निर्माण कराया जाए।
- भ्रष्ट और लापरवाह कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय जांच हो।
- छात्रों की बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाए।
निष्कर्ष और आगे की चेतावनी
वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय बिहार के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार है, जहां दूर-दराज के जिलों से हजारों युवा सपने लेकर पढ़ने आते हैं। ऐसे में परिसर का यह हाल न सिर्फ संस्थान की छवि को धूमिल कर रहा है, बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। यदि समय रहते विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस दिशा में कोई ठोस और पारदर्शी कदम नहीं उठाया, तो यह चिंगारी एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। अब देखना यह होगा कि कुंभकर्णी नींद सो रहा प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कब अपनी आंखें खोलता है और छात्रों को राहत देता है.