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भारत पानी को बना सकता है हथियार! सिंधु समझौते पर पाक मंत्री का छलका दर्द

भारत पानी को बना सकता है हथियार! सिंधु समझौते पर पाक मंत्री का छलका दर्द

कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है कि क्या भारत अपनी आक्रामक कूटनीति के तहत पानी को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने जा रहा है? पाकिस्तान के भीतर इस बात को लेकर खलबली मची हुई है कि अगर भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया, तो पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था का क्या होगा। इस बीच, पाकिस्तान के एक वरिष्ठ मंत्री अहसान इकबाल का ताजा बयान सामने आया है, जिसने दोनों देशों के बीच जल कूटनीति के मोर्चे पर एक बार फिर भूचाल ला दिया है।

पाकिस्तानी मंत्री अहसान इकबाल की चिंता और भारत का रुख

पाकिस्तानी योजना मंत्री अहसान इकबाल ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान भारत के साथ सिंधु जल संधि को लेकर अपनी गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने सीधे तौर पर आशंका जताई है कि भारत इस अंतरराष्ट्रीय समझौते का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में कर सकता है। पाकिस्तान की रीढ़ उसकी कृषि अर्थव्यवस्था है, जो मुख्य रूप से सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर निर्भर करती है। ऐसे में संधि के भविष्य को लेकर उपजा अनिश्चितता का माहौल इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब कूटनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर एक इंच भी पीछे हटने के मूड में नहीं है। खासकर सीमा पार आतंकवाद और वार्ता के समानांतर न चलने की नीति स्पष्ट होने के बाद से भारत ने हर मोर्चे पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। जल संसाधन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग करने के लिए बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित कर रहा है, जिससे पाकिस्तान की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं।

क्या है सिंधु जल संधि और यह विवाद क्यों है?

वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत पूर्वी नदियों (सतलुज, व्यास, रावी) का नियंत्रण भारत को दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, चिनाव, झेलम) का अधिकांश पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया। हालांकि, इस संधि में यह प्रावधान भी है कि भारत पश्चिमी नदियों के पानी का उपयोग कृषि, पनबिजली उत्पादन और सीमित सिंचाई के लिए कर सकता है।

  • पूर्वी नदियाँ: सतलुज, व्यास और रावी (भारत का अधिकार)।
  • पश्चिमी नदियाँ: सिंधु, चिनाव और झेलम (पाकिस्तान का अधिकार, लेकिन भारत को रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट्स की छूट)।
  • विवाद की वजह: भारत द्वारा पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण पर पाकिस्तान का लगातार आपत्ति जताना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्यस्थता की मांग करना।

आतंकवाद और पानी: अब साथ-साथ नहीं चल सकता

भारत का लंबे समय से यह कड़ा रुख रहा है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से भारत के खिलाफ संचालित होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह से नेस्तनाबूद नहीं करता, तब तक किसी भी द्विपक्षीय समझौते या बातचीत का कोई औचित्य नहीं बनता। पिछले कुछ सालों में भारत ने सिंधु जल संधि में संशोधन के लिए पाकिस्तान को आधिकारिक नोटिस भी जारी किया है, ताकि बदलते समय और जलवायु परिवर्तन की जरूरतों के अनुसार इस संधि की समीक्षा की जा सके।

पाकिस्तानी मंत्री अहसान इकबाल का यह डर बेबुनियाद नहीं है। पाकिस्तान को अब यह अहसास होने लगा है कि भारत केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि धरातल पर ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो पाकिस्तान की जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। यदि भारत पश्चिमी नदियों के अपने हिस्से के पानी को रोकने या मोड़ने की दिशा में कोई ठोस तकनीकी कदम उठाता है, तो पाकिस्तान के कृषि प्रधान प्रांत पंजाब और सिंध में भयंकर सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।

भारत के इस कदम का क्षेत्रीय राजनीति पर असर

अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि भारत सिंधु जल संधि से बाहर निकलने या उसमें बड़े बदलाव करने के अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग कर रहा है। समय बदल चुका है और भारत अब अपनी सुरक्षा और जल आवश्यकताओं को सर्वोपरि रख रहा है। पाकिस्तान की तरफ से आने वाले ऐसे बयान इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि भारत की रणनीतिक चालों का असर अब दुश्मन देश की सियासत पर साफ दिखने लगा है।

आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान अपने अड़ियल रवैये को छोड़कर आतंकवाद के मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई करता है, या फिर भारत के जल कूटनीति के दबाव में उसकी अर्थव्यवस्था और अधिक लड़खड़ाती है। फिलहाल, इतना तय है कि पानी का यह कूटनीतिक मोर्चा दक्षिण एशिया की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन चुका है।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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