उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में इन दिनों हड़कंप मचा हुआ है। प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ अपनाई जाने वाली 'जीरो टॉलरेंस' नीति अब ज़मीनी स्तर पर पूरी सख्ती के साथ लागू होती दिखाई दे रही है। इसी कड़ी में राजस्व विभाग के भीतर एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई को अंजाम दिया गया है, जिसने सुस्त पड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच खलबली पैदा कर दी है। सरकार ने अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीनता और आम जनता की शिकायतों को नजरअंदाज करने के गंभीर मामलों में पांच तहसीलदारों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है, जबकि तेरह अन्य तहसीलदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
जनता की शिकायतों पर सीधी नजर: क्यों गिरी गाज?
यह पूरी कार्रवाई किसी एक दिन का फैसला नहीं है, बल्कि लंबे समय से मिल रही जनशिकायतें, शासन स्तर पर की गई समीक्षा बैठकें और प्रशासनिक पटल पर लंबित मामलों की फेहरिस्त इसका आधार बनीं। मुख्यमंत्री कार्यालय को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि तहसील स्तर पर आम जनता के काम महीनों से अटके पड़े हैं। नामांतरण (Mutation), वरासत, पैमाइश और आय-जाति प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी कार्यों के लिए भी किसानों और आम नागरिकों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
शासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में जन समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण शामिल है। इसके बावजूद कुछ अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार लाने को तैयार नहीं थे। जब शासन स्तर पर औचक निरीक्षण और फाइलों की पेंडेंसी की समीक्षा की गई, तो इन अधिकारियों की कार्यप्रणाली में भारी खामियां पाई गईं। फाइलों को जानबूझकर लटकाना और शासन के निर्देशों की अवहेलना करना इस बड़ी कार्रवाई का मुख्य कारण बना।
निलंबित अधिकारियों पर क्या हैं आरोप?
- राजस्व वादों के निस्तारण में अत्यधिक और अकारण देरी करना।
- जनता दर्शन और पोर्टल पर आने वाली शिकायतों के प्रति उदासीन रवैया अपनाना।
- उच्च अधिकारियों के आदेशों की अनदेखी करना और क्षेत्र में संवादहीनता बनाए रखना।
- सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती बरतना।
शासन की दो टूक: काम नहीं तो कुर्सी नहीं
इस पूरी कार्रवाई से स्पष्ट संदेश जाता है कि उत्तर प्रदेश में अब प्रशासनिक अमले के लिए 'ढीले ढाले' रवैये का कोई स्थान नहीं बचा है। शासन से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री कार्यालय हर जिले के तहसील और थाना स्तर पर होने वाले कामकाज की मॉनिटरिंग खुद कर रहा है। जनता को त्वरित न्याय और पारदर्शी सेवाएं देना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिन अधिकारियों को नोटिस थमाए गए हैं, उन्हें एक निश्चित समयसीमा के भीतर अपना स्पष्टीकरण देने को कहा गया है। यदि उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो उनके खिलाफ भी निलंबन या उससे भी कड़ी विभागीय कार्रवाई की गाज गिर सकती है।
विभागीय हलकों में मचा हड़कंप
इस सख्त प्रशासनिक कदम के बाद से राजस्व विभाग के अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों में भी हड़कंप की स्थिति है। लंबे समय से फाइलों पर कुंडली मारकर बैठने वाले और दलालों के माध्यम से काम कराने वाले तत्वों में डर का माहौल बन गया है। कई तहसीलों में अचानक अधिकारियों की कार्यशैली में बदलाव देखा जाने लगा है और लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।
आम जनता और पारदर्शिता की ओर कदम
सुशासन के मोर्चे पर सरकार का यह कदम आम जनता के बीच काफी सराहा जा रहा है। आम तौर पर तहसील स्तर को भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का गढ़ माना जाता है, जहां आम आदमी को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में तहसीलदारों पर हुई यह बड़ी कार्रवाई इस बात का संकेत है कि शासन स्तर पर निचले पायदान के तंत्र को दुरुस्त करने के लिए पूरी सख्ती बरती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक कसावट लाने के लिए इस तरह के कड़े कदम बेहद जरूरी हैं, ताकि सरकारी मशीनरी जनता के प्रति जवाबदेह बन सके। आने वाले दिनों में अन्य विभागों पर भी इसी प्रकार की सख्ती देखने को मिल सकती है, क्योंकि सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रदेश में निवेश, विकास और सुशासन के माहौल को और अधिक मजबूत करना है।
आगे क्या होगी कार्रवाई?
निलंबित किए गए तहसीलदारों के खिलाफ अब विभागीय जांच (Departmental Inquiry) बिठाई जाएगी। जांच रिपोर्ट आने के बाद उनके खिलाफ सेवा से बर्खास्तगी या डिमोशन जैसी बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। वहीं, जिन 13 तहसीलदारों को नोटिस मिले हैं, उनकी फाइलों की भी नए सिरे से जांच कराई जा रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं उनके स्तर पर भी भ्रष्टाचार या गंभीर लापरवाही तो नहीं बरती गई।