पेरिस के विश्व प्रसिद्ध एफिल टावर में हाल ही में हुए एक अनोखे विवाद ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस पूरे मामले पर अब भारत के विदेश मंत्रालय ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि यह पूरा मसला संबंधित पक्षों और संस्थाओं के बीच का है, इसलिए इस पर भारत सरकार का कोई सीधा पक्ष नहीं बनता है।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा वाकया 5 सितंबर को सामने आया, जब भारतीय मूल के प्रतिष्ठित धार्मिक संगठन बीएपीएस (BAPS) का एक प्रतिनिधिमंडल पेरिस स्थित एफिल टावर की निजी यात्रा पर पहुंचा था। गौरतलब है कि बीएपीएस ने हाल ही में पेरिस के पास अपना पहला भव्य पारंपरिक हिंदू मंदिर स्थापित किया है। इसी उद्घाटन और यात्रा के सिलसिले में प्रतिनिधिमंडल वहां गया हुआ था।
सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल में शामिल ब्रह्मचारी साधुओं और संतों की कुछ धार्मिक मान्यताएं और प्रतिज्ञाएं होती हैं, जिसके तहत वे महिलाओं के सीधे संपर्क या बातचीत से परहेज करते हैं। इस धार्मिक नियम का पालन कराने के लिए एफिल टावर का संचालन करने वाली आधिकारिक संस्था 'एसईटीई' (SETE) ने कथित तौर पर यात्रा के दौरान कुछ महिला कर्मचारियों को उन क्षेत्रों से हटा दिया था या उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों की अस्थाई तैनाती कर दी थी।
विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रतिक्रिया
नई दिल्ली में साप्ताहिक प्रेसवार्ता के दौरान जब इस घटना को लेकर सवाल पूछा गया, तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बेहद नपे-तुले अंदाज में अपनी बात रखी। प्रवक्ता ने कहा, "हमें पेरिस क्षेत्र में बीएपीएस संस्था द्वारा एक मंदिर के उद्घाटन की पूरी जानकारी है। जहां तक एफिल टावर से जुड़े इस विशेष और आंतरिक मुद्दे का सवाल है, तो यह पूरी तरह से संबंधित संस्थाओं और पक्षों के बीच का आपसी मामला है।"
मंत्रालय के इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि भारत सरकार इस प्रशासनिक और स्थानीय विवाद में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने से बच रही है, क्योंकि यह पूरी व्यवस्था पेरिस के स्थानीय प्रशासन और वहां की संचालन एजेंसी के स्तर पर की गई थी।
कर्मचारियों की हड़ताल और टावर की बंदी
यह मामला तब तूल पकड़ गया जब 7 सितंबर को एफिल टावर के स्थानीय कर्मचारियों ने इस कथित लैंगिक आधार पर की गई व्यवस्था के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन और हड़ताल शुरू कर दी। कर्मचारियों का तर्क था कि कार्यस्थल पर इस तरह का बदलाव और लैंगिक भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
कर्मचारियों के अचानक काम ठप करने के कारण ऐतिहासिक एफिल टावर को पर्यटकों के लिए अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, जिससे दुनिया भर से आए सैलानियों को भारी निराशा का सामना करना पड़ा। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए संचालन संस्था एसईटीई ने तुरंत हरकत में आते हुए इस व्यवस्था को अपनी बड़ी प्रशासनिक भूल माना और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।
धार्मिक संगठन ने भी जताया खेद
विवाद बढ़ता देख बीएपीएस संस्था की ओर से भी एक आधिकारिक बयान जारी किया गया। संगठन ने इस पूरी घटना पर गहरा खेद व्यक्त किया और स्पष्ट किया कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था जिससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे या कार्यस्थल पर असंतोष पैदा हो। संस्था ने भी इस अनपेक्षित घटना के लिए माफी मांगी है।
फ्रांस में अभी भी जारी है जांच
चूंकि यह मामला फ्रांस के श्रम कानूनों और लैंगिक समानता के अधिकारों से जुड़ा हुआ है, इसलिए वहां के स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांच कर रहे हैं। फ्रांस जैसे देश में कार्यस्थल पर लैंगिक समानता के नियम बेहद कड़े हैं, यही वजह है कि यह प्रशासनिक चूक वहां एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन गई।
भले ही विदेश मंत्रालय ने इसे दोनों पक्षों का निजी मसला बताकर किनारा कर लिया हो, लेकिन यह घटना सांस्कृतिक मान्यताओं और आधुनिक पश्चिमी प्रशासनिक नियमों के बीच के टकराव का एक अनूठा उदाहरण बन गई है, जिस पर अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।