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शिव और शक्ति के मिलन से मिलती है सफलता, कार्तिकेय वाजपेयी का युवाओं को मंत्र

शिव और शक्ति के मिलन से मिलती है सफलता, कार्तिकेय वाजपेयी का युवाओं को मंत्र

जीवन में सफलता और उत्कृष्टता पाने के लिए हमें अक्सर बाहरी दुनिया की भगादौड़ में उलझे रहने की सलाह दी जाती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि असली परफेक्शन कहां से आता है? हाल ही में भोपाल के प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में एक ऐसा ही अनूठा संवाद देखने को मिला, जहां प्रख्यात लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर कार्तिकेय वाजपेयी ने युवाओं के सामने जीवन के कुछ ऐसे गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक पहलू रखे, जो आधुनिक दौर में हर छात्र और पेशेवर के लिए बेहद जरूरी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि करियर से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक, उत्कृष्टता हासिल करने की कुंजी 'शिव और शक्ति' के तालमेल में छिपी है।

भीतर का मौन दृष्टा और शिव-शक्ति का योग

कार्तिकेय वाजपेयी ने विद्यार्थियों से संवाद के दौरान भारतीय दर्शन के बहुत ही सुंदर और गहरे सूत्र को सामने रखा। उन्होंने समझाया कि हर इंसान के भीतर एक मौन दृष्टा हमेशा मौजूद रहता है। यही स्थिरता की अवस्था असल में 'शिव तत्व' है, जबकि दूसरी ओर प्रकृति निरंतर सृजन करती रहती है, जो कि 'शक्ति' का स्वरूप है।

उन्होंने बहुत ही सहजता से समझाया कि किसी भी कार्य में परफेक्शन या उत्कृष्टता लाने के लिए मन की स्थिरता पहली शर्त है। जब तक भीतर स्थिरता नहीं होगी, तब तक ऊर्जा का सही दिशा में सृजन नहीं हो सकता। इस प्रकार देखा जाए तो जीवन में उत्कृष्टता और पूर्णता का आना और कुछ नहीं, बल्कि शिव और शक्ति का एक अद्भुत योग है।

बुद्धि और विवेक का अंतर समझना है जरूरी

आज के इस दौर में जहां हर युवा केवल अपनी संज्ञानात्मक क्षमता यानी बुद्धि के बल पर आगे बढ़ना चाहता है, वहां वाजपेयी ने एक बहुत बड़ा वैचारिक अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि बुद्धि और विवेक दोनों अलग-अलग चीजें हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि के साथ इस दुनिया में जन्म लेता है, जो उसकी सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता है। लेकिन, 'विवेक' को विरासत में नहीं पाया जा सकता, उसे अपने जीवन के अनुभवों से अर्जित करना पड़ता है।

विवेक प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को एक साधक बनना पड़ता है। जीवन के वास्तविक उद्देश्य का इसी विवेक से गहरा नाता है। उन्होंने विद्यार्थियों के सामने एक ऐसा सवाल रखा जिस पर हर युवा को सोचना चाहिए— क्या मनुष्य खुद अपने जीवन का उद्देश्य तलाशता है, या फिर जब वह भीतर से पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब जीवन खुद उसके सामने उसका उद्देश्य लेकर आता है?

डिजिटल युग और कम होते एकाग्रता काल की चुनौती

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकाग्रता की कमी (Attention Span) है। इस विषय पर खुलकर बात करते हुए वक्ता ने कहा कि आज का समय बहुत अप्रत्याशित है। मनुष्य अक्सर अपने वर्तमान को अतीत की यादों या भविष्य की चिंताओं के चश्मे से देखने की भूल करता है।

  • अतीत की तुलना: व्यक्ति को अक्सर मानसिक दुख देती है।
  • भविष्य की दृष्टि: मन में लालसा और बेचैनी पैदा करती है।
  • परिणाम: इन दोनों के चक्कर में इंसान 'वर्तमान क्षण' में पूरी तरह जी ही नहीं पाता।

उन्होंने आगाह किया कि आज के डिजिटल एल्गोरिथम ने इंसानों को उनकी अपनी मौलिकता और वास्तविकता से काफी हद तक दूर कर दिया है। यदि कोई व्यक्ति अपने बारे में राय या विचार भी सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से ही तय करने लगे, तो वह धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खो बैठता है। इसलिए बहुत जरूरी है कि इंसान खुद से सवाल करे, खुद को वक्त दे, ताकि उसकी मौलिकता और प्रामाणिकता बनी रहे।

अनुभव की गहराई और सृजनात्मकता का संबंध

एकाग्रता कैसे बढ़ाई जाए? इस पर वाजपेयी ने बहुत ही व्यावहारिक नुस्खा दिया। उन्होंने बताया कि जब आप किसी भी घटना या काम को सतही तौर पर देखने के बजाय उसके अनुभव की गहराई में उतरते हैं, तो दिमाग में चलने वाले अनावश्यक विचारों का शोर अपने आप कम हो जाता है।

जब अनुभव करने की क्षमता बढ़ती है, तो व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य की तरफ अधिक स्पष्टता और तेजी से आगे बढ़ता है। जीवन को गहराई से जीने पर ही भीतर असली सृजनात्मकता (Creativity) का जन्म होता है। आज के समय में प्रासंगिक बने रहना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी यह साहस रखना है कि आप अपने वास्तविक स्वरूप को बिना किसी लाग-लपेट के दुनिया के सामने व्यक्त कर सकें।

अपनी पुस्तक 'द अनबिकमिंग' पर की खास चर्चा

इस पूरे संवाद के दौरान कार्तिकेय वाजपेयी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द अनबिकमिंग’ (The Unbecoming) के कुछ खास प्रसंगों पर भी चर्चा की। यह किताब एक ऐसे महत्वाकांक्षी क्रिकेटर और उसके कोच के सफर की कहानी है, जो लगातार पूर्णता (Perfection) की तलाश में आगे बढ़ते हैं। पुस्तक के माध्यम से उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि कैसे बाहरी उपलब्धियों की अंधी दौड़ से निकलकर व्यक्ति अपने भीतर की यात्रा पूरी कर सकता है।

उन्होंने इंद्रियों के संयम पर बात करते हुए कहा कि हमारी इंद्रियां बाहरी दुनिया से संपर्क साधने के लिए बनी हैं, जो हमें चारों तरफ की परिस्थितियों से अवगत कराती हैं। लेकिन जब इन इंद्रियों को साधकर स्थिर किया जाता है, तो भीतर एक अद्भुत सहजता का विकास होता है। इसे भारतीय परंपरा में 'कृष्ण चेतना' या 'कृष्ण तत्व' के रूप में भी समझा जा सकता है, जहां तमाम हलचल के बीच भी व्यक्ति भीतर से शांत और स्थिर रहता है।

औपचारिक डिग्रियों से आगे देखने की जरूरत

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु (Vice-Chancellor) विजय मनोहर तिवारी ने छात्रों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि विद्यार्थियों के जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल किसी विश्वविद्यालय की डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। औपचारिक शिक्षा अपनी जगह अहम है, लेकिन इसके साथ-साथ युवाओं को अपनी छिपी हुई प्रतिभा को पहचानना चाहिए और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसका सकारात्मक उपयोग करना सीखना चाहिए। उन्होंने विशेष तौर पर विद्यार्थियों को लेखन और सृजनात्मक कार्यों के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

निष्कर्ष: स्वयं को खोजने की एक सतत यात्रा

अंत में कार्तिकेय वाजपेयी ने इस बात पर जोर दिया कि संपूर्ण जीवन और कुछ नहीं बल्कि 'स्वयं को खोजने की एक यात्रा' (Journey of Self-Discovery) है। यदि कोई भी इंसान अपने काम से पूरी तन्मयता और एकाग्रता के साथ जुड़ जाए और जीवन की फालतू की बनावटी चीज़ों से खुद को विरक्त कर ले, तो वह अपने लक्ष्यों को बहुत आसानी से पा सकता है। असली क्रिएटिविटी कभी भी दबाव में नहीं, बल्कि सहजता के साथ ही आती है। छात्रों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने यह भी बताया कि हम समय की महत्ता को किस रूप में अनुभव करते हैं, यही हमारी सफलता की दिशा तय करता है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

Writer (स्थानीय खबरें)

निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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