मध्य प्रदेश के धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र अमरकंटक में उस समय राजनीतिक और धार्मिक हलचल तेज हो गई, जब ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी के परम धर्म सांसद श्रीधर शर्मा ने सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म को ऊंचाइयों की सीढ़ी बनाकर देश को जातिभेद में बांटने का सिलसिला अब रुकना चाहिए। श्री शर्मा ने कहा कि भगवान राम केवल किसी एक राजनीतिक दल की आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि यह करोड़ों सनातनियों की अटूट श्रद्धा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का मुख्य आधार हैं। ऐसे में भगवान राम के नाम पर राजनीति करना और सनातन धर्म के वास्तविक मार्गदर्शक संतों की उपेक्षा करना पूरे सनातन समाज के लिए गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है.
भगवान राम राजनीति के नहीं, समूचे समाज की आस्था
सत्तारूढ़ दल पर कड़ा प्रहार करते हुए श्रीधर शर्मा ने आरोप लगाया कि जो लोग आज भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और महापुरुष बता रहे हैं, वही लोग अपने राजनीतिक और चुनावी लाभ के लिए भगवान की परिभाषा और सनातन की दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि भगवान राम किसी भी दल, व्यक्ति या सत्ता की बपौती नहीं हैं, बल्कि वे समूचे सनातन समाज की अमूल्य आस्था हैं। जब तक राजनीतिक दल इस मूल भावना को नहीं समझेंगे, तब तक समाज में वैचारिक मतभेद दूर नहीं हो सकते.
राम मंदिर आंदोलन में संतों के बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है?
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के ऐतिहासिक संघर्ष को याद करते हुए श्री शर्मा ने कहा कि मंदिर निर्माण की वैचारिक और धार्मिक पृष्ठभूमि तैयार करने में संत समाज की अग्रणी और ऐतिहासिक भूमिका रही है। उन्होंने ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के योगदान का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि के विषय को लेकर संतों ने लंबी और कठिन लड़ाइयां लड़ी हैं। इसके अलावा, वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने भी संत परंपरा और धार्मिक पक्ष को न्यायालय के समक्ष पूरी मजबूती से रखा। ऐसे में, मंदिर के भव्य निर्माण के बाद उसी संत समाज को हाशिए पर धकेल देना और किनारे कर देना सनातन परंपरा के प्रति गंभीर प्रश्न खड़े करता है.
संतों ने जोड़ा, राजनीति ने हमेशा बांटने का काम किया
श्रीधर शर्मा ने समाज की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि संत समाज ने सदियों से समाज को जोड़ने, सामाजिक समरसता स्थापित करने और समाज के सबसे कमजोर वर्गों की आवाज बनने का कार्य किया है। जब-जब समाज में जातिगत विभाजन और वैमनस्य बढ़ाने वाली परिस्थितियां पैदा हुईं, तब-तब सनातन संतों ने आगे आकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई है और इसके लिए कई बार अपमान व विरोध भी झेला है। संतों की भूमिका सिर्फ मंदिरों और मठों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि गौसेवा, शिक्षा, संस्कृति और गरीबों की सहायता जैसे विषयों पर वे निरंतर काम कर रहे हैं.
गौवंश सेवा पर सरकार को घेरा
गौवंश संरक्षण के मुद्दे पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए श्री शर्मा ने कहा कि गौमाता के नाम पर राजनीति करना बेहद आसान है, लेकिन सड़कों पर दर-दर भटकते गौवंश, बदहाल गौशालाओं की वास्तविक स्थिति और किसानों के सामने खड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान निकालना उतना ही कठिन है।
- अनेक संत और धार्मिक संस्थाएं अपने स्तर पर लगातार गौसेवा कर रही हैं।
- सरकार को केवल चुनावी घोषणाओं और आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
- गौशालाओं की व्यवस्था, चारे और चिकित्सा का स्थायी प्रबंधन धरातल पर दिखना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और गौमाता का नाम लेकर भावनात्मक माहौल तैयार करना अलग बात है और जमीन पर सनातन मूल्यों की रक्षा करना बिलकुल अलग बात है।
संतों का काम सत्ता का समर्थन नहीं, मार्ग दिखाना है
स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के रुख का समर्थन करते हुए श्रीधर शर्मा ने कहा कि उन्होंने हमेशा संत परंपरा और अपने धार्मिक दायित्व को पूरी दृढ़ता से निभाया है। उन्होंने धर्म, गौवंश और सनातन संस्कृति से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों को समय-समय पर मजबूती से उठाया है। श्री शर्मा ने कहा कि किसी संत की बात यदि सत्ता के अनुकूल हो तो उसे सम्मान देना और असहमति होने पर उसे विवाद का विषय बना देना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है। संतों का असली दायित्व सत्ता का समर्थन करना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सत्ता को धर्म और मर्यादा का सही मार्ग दिखाना होता है.
धरातल पर काम की जरूरत, सिर्फ नारों से नहीं चलेगा काम
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ केवल बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन करना, भव्य मंदिर निर्माण करवाना या राजनीतिक मंचों से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाना भर नहीं है। सनातन की असली आत्मा सत्य, मर्यादा, करुणा, सेवा, गौसंरक्षण और सामाजिक समरसता में बसती है। यदि सत्ता वास्तव में सनातन की हितैषी होने का दावा करती है, तो उसे संत समाज का वास्तविक सम्मान करना होगा और समाज को जाति व वर्ग के नाम पर बांटने वाली राजनीति से ऊपर उठना होगा। अंत में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि सनातन धर्म किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं है, और संतों की उपेक्षा अंततः पूरे सनातन समाज के लिए भारी नुकसानदायक साबित होगी.