चिकित्सा जगत के सबसे बड़े संस्थानों में शुमार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) से एक बेहद झकझोर देने वाली और व्यवस्था की पोल खोलने वाली खबर सामने आई है। राजस्थान की रहने वाली एक मासूम बच्ची पूरे 13 साल तक अस्पताल के चक्कर काटती रही, लेकिन उसे समय पर न तो सही इलाज मिल पाया और न ही वो जीवन रक्षक प्रक्रिया पूरी हो सकी जिसकी उसे सख्त जरूरत थी। आखिरकार, हार्ट-लंग्स ट्रांसप्लांट (Heart-Lung Transplant) की प्रक्रिया शुरू होने से कुछ वक्त पहले ही उस नन्हीं जान ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
13 साल का लंबा इंतजार और अंत में खाली हाथ
यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की मौत की नहीं है, बल्कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली की उन दीवारों की है जहां कागजी कार्रवाई और लंबी वेटिंग लिस्ट अक्सर इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ जाती है। राजस्थान के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली तनवी (बदला हुआ या मूल नाम संदर्भानुसार) को दिल और फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी थी। परिवार ने अपनी आखिरी पूंजी तक इस उम्मीद में झोंक दी कि किसी दिन एम्स के डॉक्टरों का जादुई हाथ उनकी बेटी की जिंदगी बचा लेगा।
लेकिन सिस्टम की सुस्त रफ्तार और संसाधनों की भारी कमी ने इस उम्मीद को धीरे-धीरे घोट दिया। लगातार 13000 से ज्यादा घंटों और 13 लंबे वर्षों तक फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रहीं। तारीख पर तारीख मिलती रही, लेकिन बीमारी इंतजार करने के मूड में नहीं थी। जब तक अस्पताल प्रशासन और मेडिकल बोर्ड ट्रांसप्लांट की औपचारिकताएं पूरी करने के करीब पहुंचा, बहुत देर हो चुकी थी।
क्यों नहीं हो पाया समय पर ट्रांसप्लांट?
भारत में अंगदान (Organ Donation) और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया आज भी कई जटिलताओं से घिरी हुई है। एम्स जैसे देश के शीर्ष संस्थानों में देश भर से गंभीर मरीज आते हैं। यहाँ तक पहुंचना ही अपने आप में एक संघर्ष होता है।
- भारी वेटिंग लिस्ट: देश में ऑर्गन डोनर्स की भारी कमी के कारण ट्रांसप्लांट के लिए लंबी कतारें लगी रहती हैं।
- संसाधनों का अभाव: जटिल हार्ट-लंग्स ट्रांसप्लांट जैसी सर्जरी के लिए अत्यंत विशिष्ट सेटअप की जरूरत होती है, जो मांग के मुकाबले बहुत कम है।
- प्रशासनिक देरी: मेडिकल जांच, डोनर मैचिंग और कानूनी औपचारिकताओं में लगने वाला समय कई बार गंभीर मरीजों के लिए जानलेवा साबित होता है।
परिजनों का दर्द और सिस्टम से सवाल
अपनी जिगर के टुकड़े को खो चुके माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार का कहना है कि अगर समय रहते डॉक्टरों ने थोड़ा और प्रयास किया होता या व्यवस्था ने संवेदनशीलता दिखाई होती, तो शायद आज उनकी बेटी उनके बीच होती। 13 साल का संघर्ष कोई छोटा समय नहीं होता। इस दौरान परिवार ने मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से जो झेला, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
"हम एम्स के चक्कर काटते-काटते थक गए थे। हर बार डॉक्टर नई जांच लिख देते थे। हमें उम्मीद थी कि हमारी बेटी ठीक हो जाएगी, लेकिन सिस्टम ने हमें सिर्फ तारीखें दीं, जिंदगी नहीं।" - पीड़ित परिवार का दर्द
हेल्थकेयर सिस्टम के लिए एक बड़ी चेतावनी
यह घटना देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था (Public Healthcare System) के माथे पर एक गहरा कलंक है। जब देश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान में एक बच्चे को 13 साल तक इलाज या ट्रांसप्लांट का इंतजार करना पड़े, तो यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि आम आदमी की पहुंच वास्तव में इन संस्थानों तक कितनी आसान है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की त्रासदियों से बचने के लिए देश में पीडियाट्रिक ऑर्गन ट्रांसप्लांट (Pediatric Organ Transplant) के बुनियादी ढांचे को युद्ध स्तर पर मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही, वेटिंग लिस्ट को कम करने के लिए पारदर्शी और तेज प्रक्रियाएं लागू करनी होंगी ताकि किसी और तनवी को अपनी जान गंवाने से पहले सालों इंतजार न करना पड़े।
निष्कर्ष
तनवी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी यह दर्दनाक विदाई व्यवस्था के नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ गई है। क्या हम अपने बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने में पूरी तरह नाकाम हो रहे हैं? इस सवाल का जवाब जब तक नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी खबरें हमारे समाज को अंदर तक झकझोरती रहेंगी।