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राजस्थान में BJP को बड़ा झटका, 40 साल पुराना नाता तोड़ दिग्गज नेता कांग्रेस में शामिल

राजस्थान में BJP को बड़ा झटका, 40 साल पुराना नाता तोड़ दिग्गज नेता कांग्रेस में शामिल

राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब भवानी मंडी नगर परिषद चुनाव की रणनैतिक बिसात के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) को एक के बाद एक कई बड़े झटके लगे। निकाय चुनाव के ठीक मुहाने पर खड़े राज्य में चुनावी तापमान तब और अधिक चढ़ गया जब भगवा दल के साथ चार दशकों का सफर तय करने वाले एक कद्दावर नेता ने अचानक पार्टी से किनारा कर लिया। इस राजनीतिक उठापटक ने न केवल स्थानीय समीकरणों को पूरी तरह से उलट-पलट दिया है, बल्कि दोनों ही प्रमुख दलों के खेमे में आंतरिक रणनीतिक बदलाव के लिए मजबूर कर दिया है।

40 साल का पुराना साथ छूटा, रामलाल गुर्जर ने थामा कांग्रेस का हाथ

भवानी मंडी नगर परिषद चुनाव के लिए चल रही नामांकन प्रक्रिया के अंतिम दिन राजनीतिक गलियारों में उस समय भूचाल आ गया जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष रामलाल गुर्जर ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। सिर्फ रामलाल गुर्जर ही नहीं, बल्कि उनके साथ उनकी बहू और पूर्व अध्यक्ष पिंकी गुर्जर तथा पूर्व सांसद सुगना गुर्जर ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया।

डग्ग विधानसभा क्षेत्र के उपाध्यक्ष चेतन गहलोत, ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रॉड सिंह परमार और नगर निगम कांग्रेस अध्यक्ष विनय अस्तोलिया ने इन सभी दिग्गजों का कांग्रेस का स्कार्फ पहनाकर पार्टी में स्वागत किया। चार दशकों यानी लगभग 40 सालों तक भाजपा की जड़ों को सींचने वाले रामलाल गुर्जर का इस तरह पाला बदलना भगवा खेमे के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका माना जा रहा है।

सम्मान और स्नेह की तलाश ले आई कांग्रेस में

पार्टी बदलने के बाद रामलाल गुर्जर ने अपने राजनीतिक सफर और अनुभवों पर खुलकर बात की। उन्होंने मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि उन्होंने इतने लंबे समय के बाद कांग्रेस में शामिल होने का कदम क्यों उठाया। गुर्जर के अनुसार, उन्हें कांग्रेस पार्टी के भीतर जो मान-सम्मान और स्नेह प्राप्त हुआ, उसने उन्हें इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। राजनीति के जानकारों का मानना है कि टिकट वितरण और स्थानीय स्तर पर खुद की और अपने समर्थकों की उपेक्षा से उपजा असंतोष इस बड़े फैसले की मुख्य वजह बना है।

चुनाव की दहलीज पर खड़े भवानी मंडी में एक साथ तीन प्रमुख राजनीतिक चेहरों के कांग्रेस में शामिल हो जाने से स्थानीय समीकरण अब पूरी तरह से बदल चुके हैं। इसका सीधा असर चुनावी नतीजों और जमीन पर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ना तय माना जा रहा है।

भवानी मंडी नगर परिषद चुनाव: 45 वार्डों में घमासान

राजस्थान की भवानी मंडी नगर परिषद के कुल 45 वार्डों के लिए होने वाले इस चुनाव में इस बार कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। चुनावी मैदान में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस ही आमने-सामने नहीं हैं, बल्कि आम आदमी पार्टी (AAP) और तमाम बागी निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी मैदान में उतरकर मुकाबले को बेहद दिलचस्प और चतुष्कोणीय बना दिया है। कई वार्डों में स्थिति इतनी पेचीदा है कि किसी भी दल के लिए स्पष्ट बहुमत का दावा करना नामुमकिन सा लग रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस चुनाव में नौ वार्ड ऐसे हैं जो बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक साबित होने वाले हैं। इन नौ वार्डों के चुनावी परिणाम ही तय करेंगे कि आखिरकार नगर निगम बोर्ड की कमान किसके हाथ में जाएगी और बहुमत का जादुई आंकड़ा कौन छू पाएगा।

टिकट वितरण में देरी और बगावत का डर

दोनों ही प्रमुख दलों—भाजपा और कांग्रेस—के सामने इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती अपनों की बगावत को रोकने की रही है। यही वजह है कि दोनों दलों ने विद्रोह की संभावना को न्यूनतम करने के लिए अपनी अंतिम उम्मीदवारों की सूचियों को जारी करने में आखिरी पल तक रणनीतिक देरी की नीति अपनाई।

नामांकन प्रक्रिया के अंतिम घंटों तक टिकट के दावेदारों के बीच मंथन चलता रहा। जिन नेताओं को उनकी पसंदीदा पार्टियों से टिकट नहीं मिल पाया, उन्होंने बागी तेवर अपनाते हुए निर्दलीय ताल ठोक दी है। अनुमान है कि इस बार 45 वार्डों के लिए 250 से अधिक उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिससे मुकाबला कई स्तरों पर बहुकोणीय हो गया है।

क्या इस बार बदलेंगे पुराने सियासी समीकरण?

पिछले निकाय चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो राजनीतिक दलों के लिए इस बार की राह बिल्कुल आसान नहीं रहने वाली है। जिन वार्डों में पारंपरिक रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता था, वहां तीसरे और चौथे मोर्चे के उम्मीदवारों ने समीकरणों को पूरी तरह उलझा दिया है।

यदि भारतीय जनता पार्टी अपनी पिछली जीती हुई सीटों के आंकड़े के आसपास भी टिकने में कामयाब रहती है, तो उसके लिए बोर्ड का गठन करना थोड़ा आसान हो सकता है। इसके विपरीत, कांग्रेस पार्टी के सामने पिछली बार के राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर अपनी सत्ता स्थापित करने की तगड़ी चुनौती है।

निर्दलीय और छोटी पार्टियां बन सकती हैं 'किंगमेकर'

चुनावी गणित यह इशारा कर रहा है कि यदि आम आदमी पार्टी या मजबूत निर्दलीय उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत तक पहुंचने से रोकने में कामयाब हो जाते हैं, तो चुनाव के बाद की तस्वीर बेहद नाटकीय हो सकती है। ऐसी स्थिति में त्रिशंकु विधानसभा या परिषद जैसे हालात बनने पर ये छोटी पार्टियां और स्वतंत्र पार्षद ही 'किंगमेकर' की भूमिका निभाएंगे।

फिलहाल, रामलाल गुर्जर के कांग्रेस में शामिल होने के बाद भवानी मंडी का हर एक वार्ड हाई-प्रोफाइल बन चुका है। जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है और ऊँट किस करवट बैठता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि राजस्थान का यह निकाय चुनाव राज्य की आगामी बड़ी राजनीतिक दिशा का संकेत जरूर दे देगा।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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