भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाली गंगा जल संधि की आगामी व्यवस्था में बिहार अपने जल हितों को प्रमुखता से शामिल कराने की तैयारी में है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2051 तक की अनुमानित जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गैर-मानसून अवधि में न्यूनतम 10 हजार क्यूसेक पानी की आवश्यकता है। इस संबंध में 30 अक्टूबर 2026 को पटना के होटल चाणक्या में जल संसाधन विभाग की ओर से एक विशेष सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें तकनीकी और नीतिगत पहलुओं पर मंथन होगा।
भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को 30 वर्षों के लिए गंगा जल संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसकी निर्धारित अवधि आगामी 11 दिसंबर 2026 को पूरी हो रही है। संधि के नवीनीकरण या भावी व्यवस्था पर विचार का यह सही समय है, इसलिए बिहार सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और तकनीकी आकलन के आधार पर केंद्र सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखेगी ताकि राज्य की जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
गैर-मानसून अवधि में पानी की बढ़ती जरूरत
बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2051 तक की जल आवश्यकताओं को लेकर कराए गए वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, जनवरी से मई तक की गैर-मानसून अवधि में राज्य को कम से कम 10 हजार क्यूसेक पानी की सख्त जरूरत होगी। जानकारों का मानना है कि यदि जलाशयों और अन्य स्रोतों में पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं रहा, तो इसका सीधा असर कृषि के लिए सिंचाई, शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति और भावी औद्योगिक विकास पर पड़ेगा। बढ़ती आबादी, ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक गतिविधियों के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे गंगा में सालभर जल प्रवाह बनाए रखना अनिवार्य हो गया है।
गाद जमाव से जुड़ी चुनौतियां और बाढ़ का खतरा
बिहार में गंगा और उत्तर नदियां हिमालयी क्षेत्रों से निकलती हैं और मानसून के दौरान भारी मात्रा में गाद (सिल्ट) लेकर आती हैं। राज्य की भौगोलिक बनावट में ढाल कम होने के कारण नदी के प्रवाह की गति धीमी पड़ जाती है, जिससे गाद तल में बैठने लगती है। इस प्रक्रिया से नदी तल की ऊंचाई बढ़ जाती है और जलवहन क्षमता घट जाती है।
गाद का यह जमाव केवल बाढ़ के खतरे को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि बराजों और जलाशयों की जलधारण क्षमता को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है। बक्सर से फरक्का तक गंगा नदी में गाद की स्थिति का आकलन करने के लिए पूर्व निर्धारित हवाई सर्वेक्षण फिलहाल स्थगित किया गया है, लेकिन सेमिनार में इन तकनीकी पहलुओं पर गहराई से चर्चा होगी ताकि दीर्घकालिक समाधान तलाशे जा सकें।राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति और विशेष कोष की मांग
नदी तंत्र के पुनर्स्थापन और गाद की समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार पहले ही 'बिहार जलस्रोत पुनर्स्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026' लागू कर चुकी है। चूंकि गंगा में गाद का यह मसला अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय दायरे से जुड़ा है, इसलिए राज्य का मानना है कि इसके लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति और दीर्घकालिक कार्ययोजना होनी चाहिए।
सेमिनार के दौरान यह मांग भी जोर पकड़ेगी कि गंगा बेसिन के सभी राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय कोष का गठन किया जाए। बाढ़ प्रबंधन की भावी योजनाओं में नदी तल के वैज्ञानिक अध्ययन, गाद प्रबंधन और आवश्यकतानुसार ड्रेजिंग को शामिल करने पर भी बल दिया जाएगा।
विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर तैयार होगी रूपरेखा
आयोजित होने वाले इस सेमिनार में देश भर के जल विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और तकनीकीविदों को आमंत्रित किया गया है। इनसे जल मांग के सटीक आकलन, न्यायसंगत उपयोग, बाढ़ जोखिम को न्यूनतम करने और दीर्घकालिक उपलब्धता पर व्यावहारिक सुझाव मांगे गए हैं। विचार-विमर्श के बाद तैयार होने वाली तकनीकी और नीतिगत अनुशंसाओं को तथ्यात्मक साक्ष्यों के साथ भारत सरकार और संबंधित संस्थाओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, ताकि भावी संधि में बिहार के हितों की पूरी रक्षा हो सके।