मथुरा के वृंदावन में भक्ति और समर्पण का एक अनूठा उदाहरण सामने आया है, जहां हरियाणा के रोहतक की रहने वाली देवी इंदुलेखा ने अपने आराध्य ठाकुर बांके बिहारी को पति मानकर करवाचौथ का व्रत रखा है।
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन अपनी आध्यात्मिक परंपराओं और अनूठी कृष्ण भक्ति के लिए दुनियाभर में जानी जाती है। इसी ब्रजभूमि में हरियाणा के रोहतक से ताल्लुक रखने वाली देवी इंदुलेखा इन दिनों अपनी अनूठी आस्था को लेकर चर्चा में हैं। सुहागिन महिलाओं की तरह वह पूरी श्रद्धा और पारंपरिक नियमों के साथ करवाचौथ का पर्व मना रही हैं। करवाचौथ की शाम को वह नंदगांव पहुंचकर पारंपरिक शृंगार करेंगी और छलनी के माध्यम से अपने आराध्य ठाकुर बांके बिहारी के दर्शन कर अपना व्रत खोलेंगी।
नर्स की नौकरी छोड़कर चुनी कृष्ण भक्ति की राह
मूल रूप से रोहतक की रहने वाली देवी इंदुलेखा पिछले लगभग तीन वर्षों से वृंदावन में रह रही हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वृंदावन आने से पहले वह नर्स के रूप में अपनी सेवाएं देती थीं। समय के साथ भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनकी आस्था और भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा होता गया कि उन्होंने अपने जीवन का मार्ग पूरी तरह बदल लिया। ठाकुर बांके बिहारी के प्रति उनके समर्पण का यह आलम रहा कि वर्ष 2024 में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के साथ विवाह रचा लिया था। तब से वह ठाकुर जी को ही अपना सर्वस्व और पति मानकर जीवन व्यतीत कर रही हैं। उनके लिए कन्हैया केवल आराध्य नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे अटूट संबंध हैं।
दूसरा करवाचौथ और नंदगांव से जुड़ाव
देवी इंदुलेखा के जीवन का यह दूसरा करवाचौथ है, जिसे वह पूरी निष्ठा से मना रही हैं। आमतौर पर विवाहित महिलाएं अपने जीवनसाथी की दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं। इंदुलेखा भी इसी पारंपरिक भावना को अपने आराध्य के प्रति अगाध प्रेम के साथ निभा रही हैं।
उनकी इस भक्ति में नंदगांव का विशेष स्थान है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी इस पावन भूमि को वह अपना ससुराल मानती हैं। उनकी मान्यता है कि नंदबाबा और माता यशोदा उनके अभिभावक और सास-ससुर जैसे हैं। करवाचौथ के इस अवसर पर वह नंदगांव पहुंचकर नंदबाबा और माता यशोदा के दर्शन कर उनका आशीर्वाद भी लेंगी। ब्रज की इस भूमि में भक्तों द्वारा भगवान को सखा, पुत्र, स्वामी या प्रियतम के रूप में पूजने की प्राचीन परंपरा रही है, और देवी इंदुलेखा का यह अनुष्ठान उसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की एक अनूठी कड़ी है।