मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड स्थित मधुकरचक पंचायत का बड़ी मां काली मंदिर अपनी अलौकिक मान्यताओं और चमत्कारों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहाँ सालभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन काली पूजा के अवसर पर लगने वाले तीन दिवसीय मेले और विशेष अनुष्ठानों का यहाँ एक अलग ही महत्व है।
सनातन परंपरा में मां काली को शक्ति, साहस और बुराई का विनाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। मधुकरचक स्थित इस पवित्र दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना माता अवश्य पूरी करती हैं। क्षेत्र के लोगों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है, जिसके चलते हर साल काली पूजा पर यहाँ भारी जनसैलाब उमड़ता है।
इतिहास और कोसी की धारा मुड़ने की पौराणिक मान्यता
स्थानीय बुजुर्गों और मान्यताओं के अनुसार, कई वर्ष पूर्व कोसी नदी की मुख्य विकराल धारा इसी क्षेत्र से होकर गुजरती थी। इसके कारण यहाँ भयंकर बाढ़ आती थी और मधुकरचक गांव बसने के बाद बार-बार उजड़ जाता था। उस कठिन दौर में स्व. राजीव लोचन झा के पूर्वजों को माता कालिका की प्रतिमा स्थापित करने का स्वप्न आया था।
जब इस स्वप्न और दैवीय संकेत की चर्चा समाज में फैली, तब स्थानीय लोगों के जनसहयोग से मां काली की प्रतिमा को एक कच्चे घर में स्थापित किया गया। बुजुर्गों का मानना है कि वहाँ विधिवत पूजा-अर्चना शुरू होने के बाद चमत्कारिक रूप से कोसी नदी की धारा दूसरी ओर मुड़ गई। इस घटना के बाद से ही क्षेत्र में स्थिरता आई, लोग यहाँ बसते चले गए और मधुकरचक गांव का वर्तमान स्वरूप सामने आया।
ऐतिहासिक विकास और मंदिर का स्वरूप
इस मंदिर के इतिहास से जुड़े कई दिलचस्प पहलू हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज विवरण के अनुसार, अंग्रेजी शासनकाल के दौरान अंग्रेज शासक के दारोगा भी लक्ष्मीपुर से 'लालचंद' बनकर यहाँ गुप्त रूप से पूजा-अर्चना करने आते थे। समय बीतने के साथ वर्ष 1955 में यहाँ पहला पक्का मंदिर बनवाया गया, जो आगे चलकर जर्जर हो गया।
इसके पश्चात वर्ष 2012 में स्थानीय ग्रामीणों और जनसहयोग से एक भव्य नए मंदिर का निर्माण कराया गया। राजस्थान से काले संगमरमर पत्थर की मां काली की नई प्रतिमा मंगवाई गई और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई। मंदिर परिसर में मुख्य रूप से पंडित मोहन झा द्वारा पूजा-संपन्न कराई जाती है। इसके अलावा परिसर में भगवान शिव और हनुमान जी के मंदिर भी स्थापित हैं, जहाँ अन्य पुजारी विधि-विधान संभालते हैं।
मन्नत पूरी होने पर छागर बलि की परंपरा
मधुकरचक काली मंदिर की ख्याति अब केवल मधेपुरा जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। काली पूजा के दौरान स्थानीय निवासियों के अलावा उनके दूर-दराज के रिश्तेदार भी माता के दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं।
यहाँ मान्यता है कि जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं, वे श्रद्धा के साथ छागर (पाठा) अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के तहत काली पूजा के दिन मंदिर परिसर में एक हजार से अधिक छागरों की बलि दी जाती है। क्षेत्र के पूर्व जिला पार्षद संजय कुमार सिंह ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि काली पूजा के दिन गांव के सभी वर्ग के परिवारों की ओर से एक छागर की बलि देने की परंपरा है। इस दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ और मेले में शांति व कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कमिटी के कार्यकर्ता पूरी मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मोहन झा का कहना है कि जो भी भक्त पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ माता की आराधना करता है, उसकी मुराद अवश्य पूरी होती है। काली पूजा के इन तीन दिनों में पूरा इलाका भक्तिमय हो जाता है और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का यह केंद्र आकर्षण का मुख्य बिंदु रहता है।