एशिया की सबसे बड़ी आलू मंडियों में शुमार फर्रुखाबाद के किसान इन दिनों एक गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। लागत मूल्य तक न मिलने से नाराज अन्नदाताओं ने विरोध जताने का एक बेहद अनोखा और प्रतीकात्मक तरीका चुना है। सोमवार को जिले में 'आलू किसान बचाओ आंदोलन' के बैनर तले एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें किसान अपने गले में आलू की माला पहनकर पहुंचे। यह दृश्य देखकर हर कोई हैरान रह गया, जो किसानों के भीतर सुलगते असंतोष और बेबसी को साफ-साफ बयां कर रहा था।
मंडी समिति से कलेक्ट्रेट तक निकला आक्रोश मार्च
सातनपुर मंडी समिति परिसर में आयोजित इस जनसभा में फर्रुखाबाद के अलावा आसपास के कई अन्य जनपदों से भी भारी संख्या में किसान पहुंचे थे। किसानों का यह हुजूम ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ मंडी समिति से निकला और शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए कलेक्ट्रेट तक पहुंचा। इस दौरान सड़कों पर किसानों का रेला नजर आया और शासन-प्रशासन के खिलाफ उनकी नाराजगी खुलकर सामने आई।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे किसान आंदोलन के प्रदेश अध्यक्ष अजय अनमोल ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि खेती-किसानी आज के समय में फायदे का सौदा नहीं, बल्कि घाटे का ऐसा कुचक्र बन गई है जिससे उबरना किसानों के लिए नामुमकिन सा होता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'अधिक उत्पादन और अधिक नुकसान' का यह फॉर्मूला अब अन्नदाताओं की कमर तोड़ रहा है।
लगातार दो सालों से बर्बादी की कगार पर किसान
ज्ञापन के माध्यम से मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि पिछले दो वर्षों से किसानों को आलू के दाम नाममात्र के भी नहीं मिल पा रहे हैं। इस कारण फर्रुखाबाद समेत उत्तर प्रदेश के कई अन्य जिलों के किसान अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर हैं। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि किसानों के पास अपने परिवारों का भरण-पोषण करने तक के पैसे नहीं बचे हैं।
- किसानों पर चढ़ता जा रहा है भारी कर्ज।
- बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी कामकाज पड़े ठप।
- सरकारी खरीद केंद्रों पर ताले, किसान नहीं बेच पा रहे एक किलो भी आलू।
- आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या की कगार पर पहुंच रहे अन्नदाता।
किसानों का आरोप है कि सरकार द्वारा आलू खरीद के लिए जो क्रय केंद्र खोले गए थे, वे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए। मैदानी स्तर पर स्थिति यह रही कि वहां किसानों का एक दाना भी नहीं खरीदा गया, जिसके चलते सरकारी योजनाओं और व्यवस्था से किसानों का भरोसा तेजी से उठ रहा है।
प्रमुख मांगें: संकट से उबारने के लिए सरकार से गुहार
कलेक्ट्रेट पहुंचकर किसानों ने जिलाधिकारी के माध्यम से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में किसानों की तरफ से सात प्रमुख मांगें रखी गई हैं, जिन्हें तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने की पुरजोर मांग की गई है:
1. शीतगृहों (Cold Storage) का संपूर्ण भंडारण शुल्क सरकार भरे
किसानों का कहना है कि जब बाजार में आलू के दाम ही नहीं मिल रहे हैं, तो वे कोल्ड स्टोरेज का किराया चुकाने में असमर्थ हैं। सरकार को चाहिए कि इस संकट की घड़ी में कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू का संपूर्ण भंडारण शुल्क खुद वहन करे।
2. उत्तर प्रदेश में तत्काल प्रभाव से समाप्त हो मंडी टैक्स
अन्य कई राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी आलू पर लगने वाले मंडी टैक्स को हमेशा के लिए या कम से कम इस संकट काल में पूरी तरह से समाप्त किया जाए, ताकि व्यापारियों और किसानों को थोड़ी राहत मिल सके।
3. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और भावंतर योजना लागू हो
किसानों ने मांग की है कि हाइब्रिड आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य एक हजार रुपये प्रति क्विंटल और चिप्सोना एवं हॉलैंड किस्म के आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1500 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया जाए। यदि बाजार में इससे कम भाव बिकता है, तो सरकार 'भावंतर योजना' के तहत अंतर की राशि सीधे किसानों के खाते में ट्रांसफर करे।
4. रेल भाड़ा पूरी तरह से हो फ्री
आलू उत्पादकों को अपने राज्य से बाहर या अन्य महानगरों में फसल भेजने में भारी परिवहन लागत उठानी पड़ती है। इसलिए इस मौजूदा मंडी संकट के दौर में आलू ढुलाई के लिए रेल भाड़ा पूरी तरह से मुफ्त किया जाए।
5. किसानों का संपूर्ण कर्ज हो माफ
लगातार दो सालों से फसल के दाम न मिलने के कारण बैंक और साहूकारों के कर्ज तले दबे किसानों ने अपने संपूर्ण कर्ज को माफ करने की मांग उठाई है, ताकि वे इस कर्ज के जाल से मुक्त होकर नए सिरे से सांस ले सकें।
दिग्गज नेताओं और संगठनों की रही मौजूदगी
इस विरोध प्रदर्शन और रैली में केवल आम किसान ही नहीं, बल्कि विभिन्न संगठनों के प्रमुख चेहरे भी मजबूती के साथ डटे रहे। कार्यक्रम में प्रदेश प्रभारी अशोक कटियार, आलू निर्यातक सुधीर शुक्ला, शीतगृह संघ के महामंत्री मनोज रस्तोगी, मंडल उपाध्यक्ष प्रवीण कटियार, किसान आंदोलन के जिला अध्यक्ष अरविंद राजपूत, हर्ष गंगवार और व्यापार मंडल से सर्वेश अग्रवाल सहित तमाम गणमान्य लोग और बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।
सभी ने एक सुर में चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द ही इन सात सूत्रीय मांगों पर कोई ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।