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बिहार से लेकर दिल्ली तक क्यों मची है हलचल? राजनीतिक दलों को अचानक क्यों सताने लगी है 'Gen Z' की चिंता

बिहार से लेकर दिल्ली तक क्यों मची है हलचल? राजनीतिक दलों को अचानक क्यों सताने लगी है 'Gen Z' की चिंता

भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश बन चुका है, और इस डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यकीय लाभांश) का सीधा असर अब देश की चुनावी राजनीति पर साफ दिखाई देने लगा है। आभासी दुनिया की उपज और नई पीढ़ी के तेवर ने देश के स्थापित राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है। चाहे सत्ताधारी दल हो या मुख्य विपक्षी पार्टियां, हर कोई अब 'जेन-जी' (Gen Z) के मिजाज को भांपने और उन्हें अपने पाले में लाने की जद्दोजहद में जुट गया है। आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि रातों-रात सियासत के समीकरण इस एक वर्ग के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं?

जनसंख्या के आंकड़े जो बदलते हैं सियासत की चाल

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14 से 30 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों की आबादी लगभग 40.7 करोड़ है। देश की कुल आबादी का करीब 26 से 28 प्रतिशत हिस्सा इसी युवा वर्ग से आता है। सबसे खास बात यह है कि आने वाले 2029 के लोकसभा चुनाव तक यही विशाल आबादी चुनावी राजनीति में सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर बनने जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी और मुखर आबादी को नजरअंदाज करना अब किसी भी दल के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा होगा। यही वजह है कि पारंपरिक मुद्दों से इतर अब नौकरियां, शिक्षा, डिजिटल राइट्स और सिस्टम में पारदर्शिता जैसे विषय मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं।

बदलते तेवरों के आगे झुकने को मजबूर सरकारें

युवाओं के बदलते मिजाज और उग्र होते विरोध प्रदर्शनों ने सरकारों को तुरंत फैसले लेने पर मजबूर किया है। इसका एक बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब:

  • केंद्र सरकार और भाजपा: युवाओं के बढ़ते आक्रोश को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति में तेजी से बदलाव किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद सोशल मीडिया रील्स और डिजिटल माध्यमों के जरिए युवाओं से संवाद साधना पड़ा। वहीं, संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी यह सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि आंदोलनरत युवा हमारे अपने बच्चे हैं।
  • झारखंड सरकार: हेमंत सोरेन सरकार ने वर्ष 2014 और उसके बाद की जेपीएससी (JPSC) और सीजीएल (CGL) जैसी तमाम विवादित प्रतियोगी परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा कदम उठाया।
  • बिहार की सियासत: बिहार में शिक्षा और रोजगार के मुद्दों को लेकर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। राजद (RJD) के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव लगातार सड़कों पर उतरकर युवाओं की आवाज उठा रहे हैं, वहीं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर भी लगातार जिलों का दौरा कर नई पीढ़ी के सवालों पर हुंकार भर रहे हैं।

विपक्ष की बेचैनी और रणनीतिक घेराबंदी

कांग्रेस पार्टी से लेकर अन्य क्षेत्रीय दल तक, सब जानते हैं कि यदि युवा वर्ग उनके साथ जुड़ जाए तो सत्ता की सीढ़ी चढ़ना आसान हो जाएगा। राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के बीच जाकर उनकी नब्ज टटोल रहे हैं। वहीं, विपक्षी खेमे में इस बात की भी बौखलाहट साफ दिखती है कि जब सरकार कोई कड़ा रुख अपनाती है, तो वे तुरंत खुद को उस मोर्चे पर खड़ा पा लेते हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विपक्ष के पास फिलहाल अराजक स्थितियां उत्पन्न करने के अलावा कोई ठोस नीतिगत समाधान नहीं है, जबकि सत्ता पक्ष के पास नीतियों में संशोधन करने और युवाओं की नाराजगी दूर करने के साधन मौजूद हैं। कृषि कानूनों की वापसी या फिर नीट (NEET) पेपर लीक विवाद के बाद केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किया जाना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा सरकार विरोध की आंधी को भांपते हुए कदम पीछे खींचने से भी गुरेज नहीं करती।

2029 के चुनाव की असली चाबी

आने वाले समय में चुनाव के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं। अब पारंपरिक जातिगत समीकरणों के साथ-साथ 'डिजिटल एस्पिरेशंस' और 'करियर सिक्योरिटी' सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बन गए हैं। जो राजनीतिक दल जेन-जी की भाषा को समझ जाएगा और उनके भविष्य को सुरक्षित करने का भरोसा दिला पाएगा, वही आने वाले समय में देश की सत्ता की बागडोर संभालेगा।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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