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आखिर पीएम मोदी ने किसे कहा 'दिमागी नक्सली'? किरेन रिजिजू ने खोली पूरी पोल

आखिर पीएम मोदी ने किसे कहा 'दिमागी नक्सली'? किरेन रिजिजू ने खोली पूरी पोल

भारतीय राजनीति में एक बार फिर से शब्दों के बाणों ने सरगर्मी बढ़ा दी है। पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा का विषय बने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'दिमागी नक्सली' वाले बयान पर अब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मोर्चा संभाला है। इस पूरे विवाद के तूल पकड़ने के बाद रिजिजू ने खुलकर अपनी बात रखी है और बताया है कि आखिर प्रधानमंत्री का इशारा किसकी तरफ था।

क्या सच में विपक्ष के लिए था यह बयान?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर थी कि पीएम मोदी ने यह तंज विपक्षी दलों पर कसा है। हालांकि, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इन सभी अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है। रिजिजू ने साफ शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान का मकसद किसी भी राजनीतिक दल या विपक्षी नेता को नीचा दिखाना नहीं था।

केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि 'दिमागी नक्सली' (Brain Naxalites) वह शब्दावली है जिसका प्रयोग उन ताकतों के लिए किया गया है जो परोक्ष रूप से देश के भीतर माओवाद, उग्रवाद और अलगाववादी विचारधारा को हवा देती हैं, भले ही वे सीधे तौर पर हिंसा में शामिल न हों।

किरेन रिजिजू का बयान: गहराई से समझें

मीडिया से बातचीत के दौरान किरेन रिजिजू ने कहा कि देश को वैचारिक रूप से कमजोर करने की कोशिश करने वाले कुछ लोग सूट-बूट में रहकर भी नक्सली सोच का समर्थन करते हैं। उनके मुताबिक:

"प्रधानमंत्री जी ने देश की सुरक्षा और अखंडता के प्रति अपनी चिंता जाहिर की थी। जो लोग लोकतंत्र का फायदा उठाकर देश तोड़ने वाली ताकतों का मानसिक रूप से समर्थन करते हैं, समाज को बांटने का एजेंडा चलाते हैं, असली निशाना वे लोग थे। इसे राजनीति से जोड़ना गलत है।"

मंत्रालय के सूत्रों का भी यही मानना है कि वैचारिक आतंकवाद देश की मुख्यधारा की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा है और इसी को रेखांकित करने के लिए प्रधानमंत्री ने यह तीखा प्रहार किया था।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और सियासी बवाल

जैसे ही पीएम मोदी का यह बयान सामने आया, विपक्षी दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार असहमति की हर आवाज को 'नक्सली' या 'देशविरोधी' करार देना चाहती है। विपक्षी खेमे का कहना था कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक गूंज सकता है। चुनाव के माहौल में ऐसे बयान वैचारिक बहसों को और अधिक धार दे देते हैं।

'दिमागी नक्सलवाद' आखिर है क्या?

वैचारिक प्रदूषण का नया रूप

सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि 'दिमागी नक्सलवाद' या 'अर्बन नक्सल' जैसी शब्दावलियां उस मानसिकता को दर्शाती हैं जो हथियारों के बिना, वैचारिक और प्रोपेगेंडा के जरिए देश की व्यवस्था को चुनौती देती है। इसमें शामिल लोग अक्सर प्रतिष्ठित संस्थानों, शिक्षा जगत या मीडिया का हिस्सा बनकर देश विरोधी तत्वों के लिए सहानुभूति जुटाने का काम करते हैं।

  • वैचारिक समर्थन: हिंसा का विरोध करने का दिखावा करना लेकिन अंदरूनी तौर पर उसका समर्थन करना।
  • संस्थाओं का दुरुपयोग: लोकतांत्रिक संस्थानों का इस्तेमाल करके देश में अराजकता फैलाना।
  • नरेटिव सेट करना: गलत सूचनाओं के जरिए सरकार और सुरक्षा बलों की छवि को धूमिल करना।

निष्कर्ष

किरेन रिजिजू की इस सफाई के बाद यह तो साफ हो गया है कि सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है। आने वाले दिनों में देश की राजनीति में 'राष्ट्रवाद' बनाम 'वैचारिक स्वतंत्रता' की यह बहस और ज्यादा तेज होने के पूरे आसार हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: 'दिमागी नक्सली' शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले किसने किया था?

यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक चुनौतियों पर बात करते हुए दिया गया था।

Q2: किरेन रिजिजू ने इस बयान पर क्या सफाई दी है?

किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि यह बयान विपक्षी दलों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए था जो अलगाववादी और नक्सली विचारधारा का मानसिक समर्थन करते हैं।

Q3: अर्बन नक्सल या दिमागी नक्सली किसे कहा जाता है?

जो लोग प्रत्यक्ष रूप से हिंसा में शामिल नहीं होते, लेकिन वैचारिक रूप से उग्रवाद और देश विरोधी ताकतों का समर्थन करते हैं, उन्हें इस श्रेणी में रखा जाता है।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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