दिवाली का नाम आते ही मन में दीयों की चमक, मिठाइयों की मिठास और आतिशबाजी की गूंज आ जाती है। लेकिन जैसे-जैसे यह पावन पर्व करीब आता है, वैसे-वैसे पर्यावरण, प्रदूषण और कानूनी पाबंदियों पर बहस भी तेज हो जाती है। इस बीच, साल 2026 के इस त्योहारी सीजन में सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों के इस्तेमाल को लेकर एक बेहद संतुलित और अहम रुख साफ किया है। उच्चतम न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में स्पष्ट किया है कि वह देश में पटाखों पर किसी भी तरह का पूर्ण प्रतिबंध (Complete Ban) लगाने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने यह भी दो टूक कह दिया है कि 24 घंटे आतिशबाजी की खुली छूट भी नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने समाज के दोनों पक्षों—धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं और पर्यावरण संरक्षण—पर गहराई से विचार किया। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी एक पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक तरफ जहां त्योहारों से जुड़ी लोगों की भावनाएं और आस्थाएं हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे देश में बढ़ता वायु और ध्वनि प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या है, जिसका असर बुजुर्गों, बच्चों, बीमार लोगों और बेजुबान जीवों पर पड़ता है।
अदालत ने कहा कि इस स्थिति से निपटने के लिए एक ऐसा मध्यम मार्ग या व्यावहारिक रास्ता निकाला जाना चाहिए, जिसमें लोगों को पटाखे चलाने के लिए एक निश्चित और सीमित समय सीमा (Time Slot) दी जाए। इससे परंपरा भी बनी रहेगी और प्रदूषण के स्तर को भी नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।
ग्रीन क्रैकर्स और CSIR-NEERI की नई गाइडलाइंस
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने एक महत्वपूर्ण नोट पेश किया। इस नोट में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR-NEERI) की सलाह का हवाला दिया गया है। प्रस्ताव के अनुसार, बाजार में 'नेक्स्ट-जेनरेशन जॉइंट ग्रीन क्रैकर्स' (Next-Generation Joint Green Crackers) के सीमित और तय शर्तों के साथ इस्तेमाल की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है।
- लाइसेंस प्राप्त निर्माता: इस प्रकार के ग्रीन क्रैकर्स केवल अधिकृत और लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं द्वारा ही तैयार किए जाएंगे।
- प्रतिबंधित रसायनों पर रोक: इन पटाखों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले और प्रतिबंधित खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित होगा।
- ध्वनि सीमा (Decibel Limits): नोट में साफ किया गया है कि इन पटाखों के लिए 125 dB(AI) और 145 dB(C) की पीक शोर सीमा निर्धारित की गई है, जिसका कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होगा।
कन्फ्यूजन पर लगा विराम
अक्सर हर साल दिवाली के आसपास यह असमंजस की स्थिति बन जाती है कि राज्य सरकारों और अदालतों के नियमों के बीच आम लोग किस तरह त्योहार मनाएं। इस साल सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट रुख से इस असमंजस को काफी हद तक कम करने की कोशिश की गई है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि नियमों का पालन सख्ती से हो, इसके लिए स्थानीय प्रशासन को भी पैनी नजर रखनी होगी ताकि नियमों की आड़ में अवैध और जहरीले पटाखों की बिक्री न हो सके।
प्रदूषण और सेहत की चिंता बनाम उत्सव का उल्लास
चिकित्सकों और पर्यावरणविदों का हमेशा से यह तर्क रहा है कि सर्दियों के मौसम में पराली जलाने और मौसम में बदलाव के कारण वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पहले से ही खराब स्थिति में रहता है। ऐसे में अनियंत्रित आतिशबाजी स्थिति को और ज्यादा विस्फोटक बना देती है। सांस के मरीजों और छोटे बच्चों के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। सुप्रीम कोर्ट के इस संतुलित कदम से उम्मीद जताई जा रही है कि लोग अपनी खुशियों के साथ-साथ पर्यावरण और जनस्वास्थ्य का भी पूरा ख्याल रखेंगे।
त्योहार केवल उल्लास का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता का भी संदेश देते हैं। आने वाले दिनों में कोर्ट के इन निर्देशों के आधार पर राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन अपने स्तर पर समय सीमा और गाइडलाइंस की आधिकारिक घोषणा कर सकते हैं, ताकि हर नागरिक सुरक्षित और आनंदमय माहौल में दीपोत्सव का पर्व मना सके।
