भारतीय संसद की 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियों (Standing Parliamentary Committees) के पुनर्गठन में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद हुए सियासी उलटफेर का सीधा असर अब दिल्ली की सियासत पर भी दिखने लगा है। इस बड़े फेरबदल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करारा झटका लगा है और पार्टी के हाथ से दोनों चेयरपर्सन पद जाते रहे हैं। सदन में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के लिए यह फैसला किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
वाणिज्य और रसायन समितियों से टीएमसी की विदाई
संसदीय सूत्रों के अनुसार, जिन छह समितियों के चेयरपर्सन बदले गए हैं, उनमें टीएमसी के पास मौजूद दोनों महत्वपूर्ण पद अब छिन चुके हैं। राज्यसभा सांसद डोला सेन के नेतृत्व वाली 'वाणिज्य संबंधी संसदीय समिति' (Committee on Commerce) की कमान अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी को सौंप दी गई है।
इसके अलावा, रसायन और उर्वरक समिति (Committee on Chemicals), जिसकी अध्यक्षता पहले टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद कर रहे थे, अब लोकसभा सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार के पास चली गई है। काकोली घोष वही नेता हैं जिन्होंने हाल ही में टीएमसी के भीतर बगावत का बिगुल फूंका था और एक विद्रोही गुट का नेतृत्व करते हुए त्रिपुरा आधारित 'नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में अपने गुट के विलय का दावा किया था।
विद्रोहियों के दांव और लोकसभा अध्यक्ष का फैसला
इसी साल मई महीने में जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के परिणामों ने सबको चौंकाया, तो उसके तुरंत बाद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में टीएमसी के कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ओम बिरला से मुलाकात की थी। इस दौरान इन सांसदों ने एन-सी-पी-आई (NCPI) के साथ अपने विलय का दावा करते हुए लोकसभा में एक अलग गुट के रूप में मान्यता दिए जाने की मांग की थी। हालांकि, इस बागी गुट के राजनीतिक भविष्य पर आधिकारिक फैसला अभी तक लोकसभा अध्यक्ष के विचाराधीन है, लेकिन इस आंतरिक कलह का तात्कालिक असर संसदीय समितियों के बंटवारे पर साफ दिखाई दे दिया है।
डेरेक ओब्रायन का तीखा हमला: 'संसद को बनाया जा रहा है गहरा अंधकारमय कक्ष'
इस बड़े फेरबदल और समितियों की कुर्सी छिनने के बाद टीएमसी के राज्यसभा में संसदीय दल के नेता डेरेक ओब्रायन ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। डेरेक ओब्रायन ने अपने पत्र में लिखा कि संसद को एक 'गहरे, अंधकारमय कक्ष' (deep, dark chamber) में बदला जा रहा है।
"राज्यसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, उसके बाद कांग्रेस (दूसरी सबसे बड़ी) और टीएमसी (तीसरी सबसे बड़ी) है। और इसके बावजूद, चेयरपर्सन पद, जो हमारे पास 2024-25 और 2025-26 के दौरान था, उसे छीन लिया गया है। हमारे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है! साल 2019 में भी जब हम उच्च सदन में तीसरे सबसे बड़े दल थे, तब भी हमें वंचित किया गया था। बाद में कुछ वर्षों बाद इसे सुधारा गया था और अब स्थिति फिर से वहीं आ गई है," टीएमसी नेता ने अपने पत्र में स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखी।
संसद की समितियों का गणित और अन्य बदलाव
संसद की कार्यप्रणाली के तहत कुल 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियां होती हैं, जिनमें दोनों सदनों के सांसद सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। इनमें से आठ समितियों का संचालन राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि बाकी 16 समितियां लोकसभा अध्यक्ष के नियंत्रण में कार्य करती हैं। इन समितियों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है, जिसके पूरा होने के बाद इनका अनिवार्य रूप से पुनर्गठन किया जाता है।
शनिवार को राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा घोषित अन्य बदलावों में कांग्रेस पार्टी के भीतर भी अदला-बदली देखने को मिली है। शिक्षा संबंधी समिति (Committee on Education) की अध्यक्षता संभाल रहे वरिष्ठ कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की जगह अब पार्टी के ही दूसरे वरिष्ठ सहयोगी मुकुल वासनीक को इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
भाजपा ने भी बदले अपने तीन चेयरपर्सन
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति के तहत तीन समितियों के प्रमुखों में फेरबदल किया है। कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय समिति (Personnel, Public Grievances, Law and Justice) की कमान संभाल रहे राज्यसभा सांसद बृजलाल की जगह अब पार्टी के साथी सुजीत कुमार को नया चेयरपर्सन बनाया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि बृजलाल का उच्च सदन का कार्यकाल इसी साल नवंबर में समाप्त होने वाला है।
इसके अलावा, भाजपा ने लोकसभा सांसद बसावराज बोम्मई को हटाकर शशांक मणि को 'श्रम, वस्त्र और कौशल विकास समिति' (Labour, Textiles and Skill Development Committee) का नया प्रमुख नियुक्त किया है। रेलवे संबंधी समिति (Committee on Railways) में भी बदलाव करते हुए पार्टी ने सी.एम. रमेश की जगह सांसद सुधीर गुप्ता को इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी दी है।
इन नेताओं के पास बरकरार रही उनकी कुर्सियां
हालांकि कई बदलाव हुए हैं, लेकिन कुछ प्रमुख दलों के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी समितियों के चेयरपर्सन पद को बचाने में सफलता हासिल की है। द्रमुक (DMK) के सांसद त्रिची शिवा और कनिमोझी क्रमशः 'उद्योग समिति' और 'खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण समिति' के प्रमुख बने रहेंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर (विदेश मामलों की समिति) और चरणजीत सिंह चन्नी (कृषि समिति) को भी उनके पदों पर बरकरार रखा गया है। इसके अलावा, कांग्रेस सांसद मुकुल वासनीक शिक्षा के साथ-साथ महिला, बाल, युवा और शिक्षा मामलों से जुड़ी अन्य समितियों के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं जारी रखेंगे। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव को भी 'स्वास्थ्य और परिवार कल्याण समिति' के अध्यक्ष पद पर यथावत रखा गया है।
एनडीए गठबंधन के प्रमुख सहयोगियों जैसे जनता दल यूनाइटेड (JDU), शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के शीर्ष नेताओं के पास भी विभिन्न संसदीय समितियों की कमान पहले की तरह सुरक्षित बनी हुई है, जिससे गठबंधन के भीतर सत्ता संतुलन का पूरा ध्यान रखा गया है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बागी सांसदों के भविष्य पर लिए जाने वाले फैसले से संसद के गलियारों की राजनीति में और गर्माहट आने की पूरी संभावना है।