खेल की दुनिया में जब भी संघर्ष और सफलता की मिसाल दी जाएगी, तब-तब सोनीपत की माटी से निकली एक धावक का जिक्र जरूर होगा। एशियाई खेलों के महाकुंभ में भारत का तिरंगा एक बार फिर शान से ऊंचा लहराया है, और इस बार इस गौरवशाली पल के केंद्र में हैं हरियाणा के गन्नौर उपमंडल के छोटे से गुमड़ गांव की होनहार बेटी किरण पहल। किरण ने महिला 4x400 मीटर रिले स्पर्धा में स्वर्ण पदक (Gold Medal) पर कब्जा जमाकर न सिर्फ अपने परिवार और प्रदेश का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरे देश को गर्व करने का एक ऐतिहासिक अवसर दिया है।
ऐतिहासिक जीत: जब ट्रैक पर दौड़ी भारत की बेटियां
एशियाई खेलों के फाइनल मुकाबले में भारतीय महिला रिले टीम ने अपनी रफ्तार और गजब के तालमेल से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। किरण पहल, एमआर पूवम्मा, प्राची और विथ्या रामराज की चौकड़ी ने ट्रैक पर उतरते ही ऐसा जादू बिखेरा कि हर किसी की निगाहें उन पर टिक गईं। बेहद रोमांचक और सांस रोक देने वाले इस मुकाबले में भारतीय टीम ने निर्धारित दूरी को मात्र 3 मिनट 29.69 सेकेंड में पूरा कर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
इस खिताबी जंग में भारत ने एशियाई दिग्गजों को कड़ी टक्कर दी। भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरे स्थान पर रही बहरीन की टीम को 0.52 सेकेंड के अंतर से पीछे छोड़ा। वहीं, खेल जगत की महाशक्ति माने जाने वाले चीन को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। जैसे ही अंतिम लैप पूरी हुई और भारत के खाते में गोल्ड मेडल आया, पूरा स्टेडियम भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा।
संघर्ष के कांटों भरे रास्ते से सोने की चमक तक
किरण पहल की यह सफलता जितनी शानदार है, उनका यहां तक पहुंचने का सफर उससे कहीं ज्यादा संघर्षों से भरा रहा है। एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली किरण के लिए खेल के इस मुकाम तक पहुंचना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। एथलेटिक्स जैसे महंगे खेल में ट्रेनिंग, डाइट और टूर्नामेंट्स के खर्चे उठाना इस परिवार के लिए आसान नहीं था।
एक वक्त ऐसा भी आया था जब पैसों की तंगी के चलते किरण का खेल करियर अधर में लटकता नजर आ रहा था। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में उनकी मां माया देवी चट्टान की तरह अपनी बेटी के साथ खड़ी रहीं। फेडरेशन कप में भाग लेने के लिए जब पैसों की सख्त जरूरत थी और फॉर्म भरने की फीस तक का इंतजाम नहीं हो पा रहा था, तब मां ने अपनी तमाम सीमाओं को दरकिनार कर किसी तरह प्रवेश फीस का इंतजाम किया। मां का वह अटूट विश्वास आज सच साबित हो गया है। बेटी के गले में सजा एशियाई खेलों का यह स्वर्ण पदक उसी संघर्ष और त्याग का सबसे बड़ा सिला है।
गुमड़ गांव में दीवाली जैसा माहौल
सोमवार को जैसे ही एशियाई खेलों से किरण पहल की जीत की खबर उनके पैतृक गांव गुमड़ पहुंची, पूरा गांव जश्न में डूब गया। ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते ग्रामीण और आतिशबाजी करते लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाते नजर आए। परिवार के घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया है।
किरण के भाई रविंद्र पहल और परिवार के अन्य सदस्यों की आंखें इस बड़ी सफलता पर खुशी से नम थीं। परिवार के लोगों ने बताया कि वे पिछले कई दिनों से टीवी सेट से चिपके हुए थे और किरण के हर मुकाबले से पहले उसकी सफलता के लिए प्रार्थना कर रहे थे। आज जब उनकी बेटी ने देश के लिए गोल्ड मेडल जीत लिया है, तो उनकी सारी चिंताएं और मेहनत सफल हो गई हैं।
भारत के खेल इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय
एथलेटिक्स में 4x400 मीटर रिले स्पर्धा हमेशा से बेहद प्रतिष्ठापूर्ण मानी जाती है। इसमें चार धावकों के बीच परफेक्ट कोऑर्डिनेशन और स्टैमिना की जरूरत होती है। किरण पहल ने अपनी कला और फुर्ती से यह साबित कर दिया कि यदि ग्रामीण अंचल की प्रतिभाओं को सही मंच और हौसला मिले, तो वे दुनिया में किसी को भी पीछे छोड़ सकती हैं।
उनकी यह उपलब्धि आने वाले समय में देश की हजारों युवा बेटियों को खेलों की दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित करेगी। सोनीपत की इस लाडली ने यह साबित कर दिया है कि इरादे मजबूत हों और अपनों का साथ हो, तो अभाव के अंधेरों को चीरकर भी सफलता का सूरज उगाया जा सकता है।