अकोला जिले में बारिश के लंबे अंतराल और सूखे के कारण करीब 4.26 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की खरीफ फसलें प्रभावित हुई हैं। पिछले दो महीनों के दौरान जिले में 24 किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की जानकारी सामने आई है, जिससे ग्रामीण इलाकों में चिंता का माहौल है।
महाराष्ट्र के अकोला जिले में इस खरीफ सीजन में मौसम की दोहरी मार देखने को मिली है। पहले जुलाई महीने में हुई अतिवृष्टि के कारण खेतों में पानी भरने से फसलों को नुकसान पहुंचा। इसके बाद अगस्त और सितंबर के महीनों में बारिश का एक लंबा अंतराल रहा, जिसके चलते जमीन में नमी की कमी हो गई और सूखे जैसे हालात बन गए। इस लंबे ड्राई स्पेल से सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है।
फसल नुकसान के आंकड़े और किसानों की स्थिति
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिले में करीब 4.26 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई गई फसलें सूखे की चपेट में आई हैं। बारिश न होने के कारण सोयाबीन की फसल सूखने लगी है, वहीं कपास और अन्य फसलों के उत्पादन में भी भारी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। उत्पादन घटने और लागत न निकल पाने के कारण किसानों पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त महीने में 13 और सितंबर महीने में 11 किसानों ने कथित तौर पर आत्महत्या की। इस प्रकार इन दो महीनों में कुल 24 किसानों की जान जाने की सूचना है। इसके साथ ही, इस साल अब तक अकोला जिले में किसान आत्महत्याओं का कुल आंकड़ा 120 तक पहुंच गया है। हालांकि, इन सभी मामलों और आंकड़ों की पूरी प्रशासनिक पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन मौतों का यह सिलसिला कृषि संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है।
खेती की शुरुआती चुनौतियां और बीज संकट
इस वर्ष किसानों के लिए खरीफ सीजन की शुरुआत से ही परेशानियां बनी हुई थीं। सीजन की शुरुआत में किसानों को अपनी पसंद के कपास के बीज हासिल करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। इसके अलावा, कई जगहों पर सोयाबीन के बीजों की गुणवत्ता को लेकर भी किसानों की ओर से शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। मौसम की अनिश्चितता और इन शुरुआती अड़चनों ने किसानों की लागत को पहले ही बढ़ा दिया था।सरकारी सहायता पैकेजों पर सवाल और किसानों की मांग
संकट के इस दौर में किसान संगठनों ने सरकार की कार्यप्रणाली और सहायता घोषणाओं पर सवाल उठाए हैं। किसान संगठन के अध्यक्ष ललित बहाले ने पिछले साल बाढ़ और अतिवृष्टि के समय घोषित 31,628 करोड़ रुपये के सहायता पैकेज का जिक्र करते हुए दावा किया था कि उस पैकेज में केंद्र सरकार की सहायता और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के खर्च को भी जोड़ दिया गया था, जिससे किसानों के हाथ में आने वाली प्रत्यक्ष राशि काफी कम रह गई थी।
अब वर्तमान सूखे की स्थिति को देखते हुए किसान संगठनों ने मांग की है कि प्रभावित परिवारों को केवल कागजी घोषणाओं के बजाय वास्तविक और समय पर आर्थिक मदद दी जाए।
तत्काल राहत के साथ स्थायी समाधान की जरूरत
कृषि विशेषज्ञों और किसानों का मानना है कि इस तरह के संकट से निपटने के लिए केवल फौरी राहत काफी नहीं है। किसानों को इस चक्रव्यूह से बाहर निकालने के लिए सिंचाई के स्थायी साधनों का विकास, गांवों में पानी और चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा खेती के जोखिमों को कम करने वाले दीर्घकालीन उपायों पर काम करना बेहद आवश्यक है। फिलहाल अकोला के किसानों की निगाहें प्रशासनिक तंत्र और सरकार द्वारा घोषित होने वाले राहत पैकेजों पर टिकी हैं।