अक्टूबर 2026 के इस दौर में जब मोबिलिटी और ट्रांसपोर्ट के लिए ऐप-आधारित कैब और बाइक टैक्सियां हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं, तब महिला सुरक्षा को लेकर एक बेहद अहम और कड़ा कदम उठाया गया है। आए दिन देश के महानगरों से लेकर टियर-2 शहरों तक कैब और बाइक टैक्सियों में सफर करने वाली महिलाओं के साथ होने वाली अनहोनी, अभद्रता और सुरक्षा में सेंध की घटनाओं ने नीति निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है। इसी गंभीर स्थिति को भांपते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने एक व्यापक और सख्त दिशानिर्देशों का खाका तैयार किया है, जिसका मकसद डिजिटल परिवहन के इस दौर में हर महिला मुसाफिर को पूर्ण सुरक्षा का अहसास कराना है।
क्यों पड़ी सख्त नियमों की जरूरत?
हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से ऐप-आधारित टैक्सियों में सफर कर रही महिलाओं के उत्पीड़न, मारपीट और पहचान छिपाने जैसे संगीन मामले सामने आए हैं। कई बार ऐसा देखने को मिला है कि ऐप पर बुक की गई गाड़ी और ड्राइवर कोई और होता है, जबकि मौके पर वाहन या चालक दूसरा पहुंच जाता है। इसके अलावा, तय रूट से अचानक रास्ता भटकाना (रूट डायवर्जन), सुनसान रास्तों पर गाड़ी रोकना, पीछा करना, रात के वक्त असुरक्षित जगहों पर ड्रॉप-ऑफ करना और किसी भी आपात स्थिति में इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम (ERS) की तरफ से मिलने वाली प्रतिक्रिया में देरी जैसी गंभीर समस्याएं आम नागरिकों के लिए सिरदर्द बन चुकी हैं।
इन्हीं तमाम त्रासदियों और सुरक्षा खामियों का संज्ञान लेते हुए, राष्ट्रीय महिला आयोग ने पूरी गंभीरता के साथ ट्रांसपोर्ट एग्रीगेटर कंपनियों और संबंधित विभागों के लिए कुछ अचूक सिफारिशें पेश की हैं, जिन्हें यदि जमीन पर सख्ती से उतारा जाए, तो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर लगाम कसने में काफी हद तक मदद मिलेगी।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की प्रमुख सिफारिशें
1. चालकों का कठोर बैकग्राउंड वेरिफिकेशन (Background Verification)
आयोग की सबसे बड़ी और अहम सिफारिश ड्राइवरों के पुलिस सत्यापन को लेकर है। अक्सर यह देखा गया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग फर्जी दस्तावेजों के सहारे इन कैब या बाइक टैक्सी प्लेटफार्मों पर रजिस्ट्रेशन पा लेते हैं। आयोग का स्पष्ट निर्देश है कि हर एक ड्राइवर का रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस थानों और राष्ट्रीय डेटाबेस के जरिए बारीकी से जांचा जाना चाहिए। इसके साथ ही, समय-समय पर इनका री-वेरिफिकेशन भी अनिवार्य किया जाए ताकि किसी भी अपराधी तत्व के लिए इस सेक्टर में जगह पाना असंभव हो जाए।
2. हर वाहन में अनिवार्य रूप से हो SOS बटन
आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए हर कैब और कमर्शियल बाइक टैक्सी में एक भौतिक (Physical) या डिजिटल SOS बटन का होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। यह बटन ऐसी जगह पर होना चाहिए जो यात्री की पहुंच में बेहद आसान हो। संकट के समय जैसे ही इस बटन को दबाया जाए, तुरंत एक सिग्नल सेंट्रल कंट्रोल रूम और नजदीकी पुलिस स्टेशन तक पहुंच जाए, जिससे बिना एक भी पल गंवाए त्वरित सहायता भेजी जा सके।
3. रूट डायवर्जन और संदिग्ध ठहराव पर रियल-टाइम अलर्ट
तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अब सुरक्षा घेरे को और मजबूत करने की तैयारी है। नई सिफारिशों के मुताबिक, यदि कोई ड्राइवर तय किए गए रूट से अचानक अलग रास्ता पकड़ता है या फिर किसी सुनसान या संदिग्ध जगह पर गाड़ी को अनावश्यक रूप से काफी देर के लिए रोकता है, तो उसका एक रियल-टाइम अलर्ट ऑटोमैटिक सिस्टम जनरेट हो जाना चाहिए। यह अलर्ट तुरंत कंपनी के सेफ्टी डेस्क और मुसाफिर के चुनिंदा परिजनों तक पहुंचना चाहिए ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते टाला जा सके।
4. नाइट शिफ्ट और रात के समय विशेष सुरक्षा इंतजाम
अक्सर रात के वक्त या देर रात सफर करने वाली कामकाजी महिलाओं के लिए जोखिम सबसे ज्यादा होता है। इसे ध्यान में रखते हुए, आयोग ने नाइट आवर्स (रात के समय) के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतने की बात कही है। रात 10 बजे के बाद सफर करने वाली महिला यात्रियों के लिए ड्रॉप-ऑफ लोकेशन की लाइव मॉनिटरिंग और जरूरत पड़ने पर कॉलिंग या ट्रैकिंग जैसी अतिरिक्त लेयर्स जोड़ने की सिफारिश की गई है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि महिला सुरक्षित अपने घर के दरवाजे तक पहुंच गई है।
पहचान की गड़बड़ी और फर्जीवाड़े पर लगाम
कई मामलों में यह भी सामने आया है कि ऐप पर जो फोटो और नाम दिखाई देता है, असलियत में गाड़ी चलाने वाला शख्स कोई और होता है। यह पहचान की यह गड़बड़ी किसी बड़े अपराध को न्योता दे सकती है। आयोग ने इस दिशा में कड़ी आपत्ति जताते हुए एग्रीगेटर कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे फेस रिकग्निशन (Face Recognition) तकनीक या बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन जैसी आधुनिक व्यवस्था लागू करें, ताकि ऐप पर लॉग-इन करने वाला ड्राइवर वही व्यक्ति हो जिसकी आधिकारिक पुष्टि कंपनी के पास दर्ज है।
बदलाव की सख्त दरकार
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक और सुविधाजनक सफर के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। ऐप-आधारित टैक्सी कंपनियों को अब केवल मुनाफे पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सुरक्षा के मोर्चे पर कड़े और पारदर्शी मानक अपनाने होंगे। राष्ट्रीय महिला आयोग की ये सिफारिशें यदि देश भर में कानून का रूप लेती हैं और इनका कड़ाई से पालन होता है, तो सड़कों पर सफर करने वाली हर बहन-बेटी के मन से डर का बादल छट सकेगा और वे बिना किसी खौफ के अपनी मंजिल तक पहुंच सकेंगी।
अब देखना यह होगा कि देश की तमाम बड़ी कैब और बाइक टैक्सी एग्रीगेटर कंपनियां इन दिशा-निर्देशों को कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से अपने सिस्टम का हिस्सा बनाती हैं। आम जनता और महिला संगठनों की निगाहें अब पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि इन सिफारिशों पर अमल कब और कैसे शुरू होता है।