इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शादी का वादा करके मुकरने वाले एक आरोपित की जमानत को सख्त रुख अपनाते हुए रद कर दिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान अपने वादे से मुकर जाने पर यह कदम उठाया और मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई।
प्रयागराज में विधि संवाददाता के अनुसार, यह पूरा मामला मेरठ जिले के सरधना थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। प्रार्थी मानसी की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट में जमानत निरस्तीकरण के लिए अर्जी दाखिल की गई थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। मूल रूप से 18 मार्च को हाई कोर्ट ने एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपित को इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह पीड़िता से विवाह करेगा।
सुनवाई के दौरान जब पीड़िता मानसी और आरोपित दोनों न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए, तो आरोपित ने अदालत के सामने स्पष्ट रूप से शादी करने से इन्कार कर दिया। इसके बाद अदालत ने उसकी जमानत रद करने का आदेश पारित किया।
एसएसपी मेरठ को लगाई फटकार और चेतावनी
निश्चित समयानुसार आरोपित के अदालत में पेश न होने पर हाई कोर्ट ने 28 सितंबर को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था और एसएसपी मेरठ को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया था। निर्धारित सुनवाई के दौरान एसएसपी मेरठ अदालत के समक्ष पेश हुए और उन्होंने सफाई दी कि वह 28 सितंबर से 2 अक्टूबर तक अवकाश पर थे, जिसके चलते उनके अधीनस्थों से यह चूक हुई।
न्यायालय ने मातहतों की लापरवाही को स्वीकार तो किया, लेकिन स्पष्ट किया कि वारंट निष्पादन के मुख्य प्राधिकारी स्वयं एसएसपी होते हैं, इसलिए आरोपित को अदालत में पेश कराना उनकी सीधी जिम्मेदारी थी। हालांकि अदालत ने एसएसपी के खिलाफ कोई अन्य प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया, लेकिन उन्हें शाम चार बजे तक न्यायालय कक्ष में ही मौजूद रहने का निर्देश दिया और भविष्य में इस तरह की चूक के प्रति सतर्क रहने की कड़ी चेतावनी दी।
सीजेएम मेरठ के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश
हाई कोर्ट ने वारंट के निष्पादन में स्थानीय पुलिस और न्यायपालिका के बीच समन्वय की कमी पर भी गंभीर आपत्ति जताई। पुलिस ने वारंट तामील होने के बाद आरोपित को सीधे हाई कोर्ट में पेश करने के बजाय सीजेएम मेरठ की अदालत में पेश कर दिया था, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था।
अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस बात का पूरा संज्ञान था कि हाई कोर्ट ने आरोपित को सीधे अपने समक्ष पेश करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया है, इसके बावजूद उसे जेल भेज दिया गया। इसे घोर लापरवाही और अनुशासनहीनता करार देते हुए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति संबंधित प्रशासनिक न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की जाए, ताकि सीजेएम के विरुद्ध प्रशासनिक स्तर पर उचित और सख्त कार्रवाई की जा सके।