उत्तर प्रदेश की राजनीति में आस्था और प्रतीकों का खेल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। राज्य में हाल ही में सामने आए दो अलग-अलग और परस्पर विरोधी घटनाक्रमों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी के नेता द्वारा बौद्ध दीक्षा समारोह में हिंदू देवी-देवताओं को न मानने की प्रतिज्ञाएं दोहराई गईं, वहीं दूसरी तरफ लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को अष्टभुजा देवी के रूप में चित्रित कर उनकी आरती उतारने का मामला सामने आया है। इन दोनों घटनाओं ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है।
दो ध्रुव और एक ही समय के विरोधाभास
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आस्था अब केवल निजी क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह चुनावी रणनीतियों और राजनीतिक प्रतीकों का एक बड़ा हिस्सा बन चुकी है। अक्टूबर महीने के मध्य में घटी इन दो घटनाओं ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वे दिल्ली के अंबेडकर भवन में आयोजित एक बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने डॉ. बीआर अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को दोहराया, जिसके तहत ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण को भगवान न मानने तथा उनकी पूजा न करने की शपथ ली जाती है। वीडियो वायरल होने के बाद जब इस पर सवाल उठे, तो सफाई दी गई कि उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है, बल्कि केवल कार्यक्रम में बतौर अतिथि शिरकत की थी।
मायावती को अष्टभुजा दुर्गा के रूप में पेश करने की घटना
दूसरी घटना ठीक इसके विपरीत लखनऊ के 1090 चौराहे पर देखने को मिली, जहां आशुतोष पाठक नामक व्यक्ति द्वारा बसपा प्रमुख मायावती की तस्वीर को आठ भुजाओं वाली दुर्गा के रूप में सजाया गया। इस तस्वीर में मायावती के हाथों में संविधान, मीडिया, न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसान, उद्योग और सामाजिक न्याय जैसे विभिन्न क्षेत्रों के प्रतीक थमाए गए। इस दौरान न केवल उनकी आरती उतारी गई और शंख फूंका गया, बल्कि आयोजक ने खुद को 'मैया का पुजारी' बताते हुए मायावती को पांचवीं बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प भी लिया। इस क्रम में आगे बनारस के संत रविदास घाट पर गंगा पूजन कर वहां से गंगाजल लाकर उसी 1090 चौराहे पर पहुंचाने की योजना का भी ऐलान किया गया है।
राजनीतिक गलियारों में उठ रहे सवाल
यह दोनों ही मामले भले ही व्यक्तिगत आस्था या आयोजकों के अपने तरीकों से जुड़े होने का दावा करते हों, लेकिन इनके राजनीतिक निहितार्थ बेहद गहरे हैं। एक तरफ जहां सार्वजनिक मंचों पर हिंदू देवी-देवताओं को नकारने का प्रदर्शन किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ किसी राजनीतिक दल के जीवित नेता को देवी के रूप में पूजने की परंपरा शुरू की जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही खेमे 'सामाजिक न्याय' और 'बहुजन' के नारों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उनके रास्ते और तरीके एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हस्तियों और प्रतीकों का यह इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन जब एक ही राज्य में और महज कुछ ही दिनों के अंतराल पर ऐसे दो विपरीत दृश्य सामने आते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है कि क्या आस्था अब पूरी तरह से चुनावी प्रतीक बनकर रह गई है? क्या भगवान को नकारना भी एक राजनीतिक स्टैंड बन चुका है और किसी नेता को भगवान के समकक्ष खड़ा करना सत्ता हासिल करने का जरिया है? जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि राज्य की राजनीति आज भी काफी हद तक प्रतीकों, भावनाओं और विरोधाभासों के इर्द-गिर्द घूम रही है।