राष्ट्र की माटी के प्रति समर्पण और उसके सम्मान में गाए जाने वाले राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' ने अपने गौरवशाली सफर के 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक और पावन अवसर पर देश भर में विशेष आयोजनों का सिलसिला जारी है। इसी कड़ी में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक भव्य और प्रेरणादायी आयोजन देखने को मिला, जिसने हर किसी के दिल में देशभक्ति की अलख जगा दी। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने शहर के शैक्षिक परिवेश को राष्ट्रभक्ति के रंगों में पूरी तरह से रंग दिया।
श्री गोवर्धन सरस्वती विद्या मंदिर में गूंजा राष्ट्रगीत
शुक्रवार को देहरादून के धर्मपुर स्थित श्री गोवर्धन सरस्वती विद्या मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल का परिसर कुछ अलग ही ऊर्जा से सराबोर था। मौका था ‘नमामि भारतम्’ सामूहिक वंदे मातरम् गायन कार्यक्रम का। इस आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल विद्यालय के छात्र-छात्राएं ही नहीं, बल्कि उनके अभिभावक, पूर्व छात्र, संस्कार केंद्रों के नन्हें विद्यार्थी और आसपास के तमाम संभ्रांत नागरिक भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। सुबह के ठीक 11 बजे जब पूरा परिसर एक स्वर और एक लय में 'वंदे मातरम्' के गान से गूंजा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें गर्व से चमक उठीं और रोंगटे खड़े हो गए।
विद्यालय परिसर भारत माता की जय और वंदे मातरम् के गगनभेदी नारों से गूंज उठा। इस सामूहिक गायन ने यह साबित कर दिया कि जब बात देश और संस्कृति की आती है, तो हर पीढ़ी का हर एक नागरिक एक मंच पर आकर खड़ा हो जाता है। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी के भीतर राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रनिष्ठा की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करना था।
राष्ट्रप्रेम को सिर्फ नारों तक सीमित न रखें: धनंजय
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और देहरादून विभाग के विभाग प्रचारक धनंजय ने इस अवसर पर बेहद सारगर्भित और वैचारिक उद्बोधन दिया। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि राष्ट्रप्रेम को केवल जुबानी जमा-खर्च या भावनाओं तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे अपने दैनिक आचरण और नागरिक दायित्वों के जरिए जीवन में उतारना जरूरी है।
उन्होंने कहा, “'वंदे मातरम्' केवल एक गीत नहीं है, यह इस भारतभूमि के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा, मातृभूमि के प्रति अनंत समर्पण और हमारी अटूट राष्ट्रभक्ति का जीवंत प्रतीक है। जब देश स्वतंत्रता के संग्राम से गुजर रहा था, तब इस एक अकेले गीत ने देशवासियों के भीतर राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने और सोए हुए समाज को जगाने में मील का पत्थर साबित होने वाली भूमिका निभाई थी।”
उन्होंने आगे कहा कि आज जब हम इस महान गीत की 150वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो यह हमारे लिए आत्ममंथन करने का भी समय है। यह अवसर हमें राष्ट्र, संस्कृति और अपनी मातृभूमि के प्रति हमारे अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग होने की प्रेरणा देता है। सच्चा राष्ट्रप्रेम यही है कि हम अपने क्षेत्र में रहते हुए ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करें।
विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस गरिमापूर्ण आयोजन में समाज के विभिन्न क्षेत्रों की कई जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की और अपने बहुमूल्य विचार साझा किए। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त विंग कमांडर कुमुद सेठी उपस्थित रहीं। उन्होंने अपने प्रेरणादायक जीवन अनुभव साझा करते हुए युवाओं को देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व प्रधानाचार्य (रा.इ.का. रुड़की) डॉ. जी.एल. भट्ट ने भी उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य व गीतों की शक्ति पर प्रकाश डाला। इसके अलावा, कार्यक्रम में साक्षी अधिकारी एवं उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. डी.पी. जोशी, सत्यापन अधिकारी एवं पूर्व राज्य सूचना आयुक्त विवेक शर्मा, तथा सत्यापन अधिकारी एवं पूर्व छात्रा व वन क्षेत्राधिकारी उर्वशी गौतम ने भी विशेष रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और युवाओं का मार्गदर्शन किया।
विद्या भारती का देशव्यापी अभियान
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह आयोजन केवल देहरादून तक ही सीमित नहीं था, बल्कि विद्या भारती से जुड़े देश भर के तमाम सरस्वती शिशु मंदिरों और विद्या मंदिरों में एक निर्धारित समय पर सामूहिक वंदे मातरम् गायन का आयोजन किया गया। इस राष्ट्रव्यापी अभियान का मूल मंत्र देश के कोने-कोने तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश पहुंचाना और हर छात्र के मन में देश के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा करना था।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक प्रमुख जगदीश, अनिल नंदा, प्रांत खेल संयोजक रविंद्र रावत, प्रबंध समिति के सम्मानित सदस्य नीरज मित्तल और घनश्याम अग्रवाल, स्थानीय क्षेत्रीय पार्षद विमल उनियाल, धर्मपुर मंदिर समिति के अध्यक्ष सीताराम भट्ट सहित विद्यालय परिवार के तमाम शिक्षक, आचार्य और कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय गीतों का महत्व
आज के इस आधुनिक और तकनीकी युग में जहां युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है, ऐसे आयोजन एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु का काम करते हैं। 'वंदे मातरम्' का इतिहास बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उस उपन्यास ‘आनंदमठ’ से जुड़ा है जिसने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों में ऐसी आग जलाई थी जो गुलामी की बेड़ियों को पिघलाने में कामयाब रही। इसके 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाना असल में उन तमाम बलिदानियों को याद करना है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
कार्यक्रम के समापन पर सभी ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे अपने दैनिक जीवन में अनुशासन, ईमानदारी और देशहित को सर्वोपरि रखेंगे। यह आयोजन आने वाले कई दिनों तक देहरादून के शैक्षिक और सामाजिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहेगा, और यह संदेश दूर-दूर तक जाएगा कि भारत की युवा शक्ति अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर पूरी तरह जागरूक और प्रतिबद्ध है।