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1965 युद्ध: 6-7 सितंबर की वह रात जब बदल गया था भारत-पाक जंग का पूरा रुख

1965 युद्ध: 6-7 सितंबर की वह रात जब बदल गया था भारत-पाक जंग का पूरा रुख

भारतीय इतिहास के पन्नों में सितंबर का महीना हमेशा से एक विशेष महत्व रखता है। साल 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हमारे सैन्य इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें भारतीय सेना के अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल ने दुश्मन के हर नापाक मंसूबों को धूल चटा दी थी। इस युद्ध के दौरान कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने जंग के समीकरण को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। इनमें से सबसे निर्णायक और महत्वपूर्ण रात 6 और 7 सितंबर 1965 की दरमियानी रात थी। इस एक रात में जो कुछ हुआ, उसने न सिर्फ युद्ध के मैदान की दिशा बदली, बल्कि दोनों देशों के बीच सामरिक संतुलन को भी हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया।

अचानक छिड़ी जंग और 1965 के हालात

साल 1965 की शुरुआत से ही भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव लगातार बढ़ रहा था। अगस्त के महीने में पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' के तहत कश्मीर में घुसपैठिए भेजे, जिनका मकसद स्थानीय लोगों को भड़काना और कश्मीर घाटी पर कब्जा करना था। लेकिन भारतीय सुरक्षा बलों और स्थानीय नागरिकों की सतर्कता ने इस साजिश को नाकाम कर दिया। इसके बाद, 1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' के तहत छंब सेक्टर में एक बड़ा टैंक हमला कर दिया। इस हमले का मुख्य उद्देश्य अखनूर पर कब्जा करके भारत के मुख्य सप्लाई रूट को काटना था।

भारतीय नेतृत्व और सेना प्रमुख जनरल जे.एन. चौधरी के सामने अब स्थिति बेहद गंभीर थी। पाकिस्तान की पै ़र और आधुनिक अमेरिकी पैटन टैंकों की ताकत से लैस सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। ऐसे में भारत के पास अपनी रक्षा के लिए और युद्ध का दायरा बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लेते हुए अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करने की अनुमति दे दी, ताकि दुश्मन को उसी के घर में जवाब दिया जा सके।

6-7 सितंबर 1965 की वह ऐतिहासिक रात

यहीं से शुरुआत होती है 6 और 7 सितंबर की उस कड़कती रात की, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के दृढ़ राजनीतिक नेतृत्व और सेना के उच्च अधिकारियों की योजना के तहत, भारतीय सेना ने पंजाब सेक्टर में पश्चिमी मोर्चे पर एक साथ तीन दिशाओं से हमला बोल दिया। इस मोर्चेबंदी का मुख्य उद्देश्य लाहौर और सियालकोट की तरफ से पाकिस्तानी सेना का ध्यान भटकाना और उनकी मुख्य ताकत को छिन्न-भिन्न करना था।

रात के सन्नाटे को चीरती हुई भारतीय तोपखाने (आर्टिलरी) की गड़गड़ाहट ने लाहौर के बाहरी इलाकों तक दुश्मन को चौंका दिया। पाकिस्तान को यह कभी उम्मीद नहीं थी कि भारत अपनी सीमा पार करके सीधे अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर इतनी बड़ी जवाबी कार्रवाई करेगा। इस रात भारतीय infantry (पैदल सेना) और armor (बख्तरबंद गाड़ियां) ने अंधेरे का फायदा उठाते हुए अपनी पोजीशन मजबूत की और दुश्मन के डिफेंसिव लाइंस को भेदना शुरू कर दिया।

लाहौर मोर्चा और रणनीतिक दबाव

भारतीय सेना की पश्चिमी कमान ने जब लाहौर सेक्टर की तरफ कूच किया, तो पाकिस्तान की सेना में हड़कंप मच गया। रातों-रात पाकिस्तानी सेना के कमांडरों को अपनी प्रायोरिटी बदलनी पड़ी। जो पाकिस्तानी फौज कुछ घंटे पहले तक अखनूर और जम्मू-कश्मीर में भारत को घेरने की योजना बना रही थी, उसे अब अपने सबसे बड़े और अहम शहर लाहौर को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

इस रात के ऑपरेशंस की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि भारतीय सैनिकों ने बिना किसी बड़े नुकसान के दुश्मन के कई मोर्चों पर कब्जा कर लिया था। बरकी और खेमकरण सेक्टर में जो गतिविधियां शुरू हुईं, उन्होंने आने वाले दिनों में इतिहास की सबसे भीषण टैंक लड़ाइयों (विशेष तौर पर असल उत्ताड़ की लड़ाई) की जमीन तैयार कर दी थी।

युद्ध का रुख बदलने वाले प्रमुख कारक

6-7 सितंबर की रात ने युद्ध के परिदृश्य को पूरी तरह से क्यों बदल दिया, इसके पीछे कई सामरिक कारण थे:

  • सरप्राइज एलिमेंट (अचानक हमला): पाकिस्तान को यह अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि भारत पश्चिमी पंजाब की सीमा पर एक साथ बड़ा हमला कर देगा। इस रणनीतिक सरप्राइज ने पाकिस्तानी सेना के होश उड़ा दिए।
  • दुश्मन की योजना का फेल होना: पाकिस्तान का पूरा ध्यान कश्मीर को हथियाने पर था, लेकिन इस रात के हमले के बाद उसे अपनी सेना को वापस पंजाब की रक्षा के लिए लगाना पड़ा।
  • मनोवैज्ञानिक बढ़त: इस जवाबी कार्रवाई से भारतीय सैनिकों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया, जबकि पाकिस्तानी सेना रक्षात्मक मुद्रा में आने को मजबूर हो गई।

असल उत्ताड़ और पैटन टैंकों का कब्रिस्तान

6-7 सितंबर की रात को जो बीज बोया गया था, उसका असर अगले कुछ दिनों में दुनिया ने खेमकरण सेक्टर में देखा। पाकिस्तान के पास अमेरिकी तकनीक से बने 'पैटन' टैंक थे, जिन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक टैंकों में गिना जाता था। पाकिस्तान को अपने इन टैंकों पर बहुत घमंड था। लेकिन भारतीय सेना, विशेष तौर पर 4th माउंटेन डिवीजन और क्वार्टर मास्टर के जवानों ने अपनी रणनीतिक सूझबूझ से पैटन टैंकों के इस घमंड को चकनाचूर कर दिया।

खेमकरण के पास 'असल उत्ताड़' (Asal Uttar) की लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने गन्ने के खेतों में पानी भरकर पाकिस्तानी टैंकों को कीचड़ में फंसा दिया और एक-एक करके उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया। आज भी उस जगह को 'पैटन नगर' या टैंकों का कब्रिस्तान कहा जाता है, जहाँ पाकिस्तानी सेना के दर्जनों आधुनिक टैंक मलबे में तब्दील हो गए थे।

नेतृत्व की दृढ़ता और देश का हौसलाइस पूरी रणनीतिक सफलता के पीछे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की फौलादी इच्छाशक्ति का बहुत बड़ा हाथ था। जब सेना प्रमुख ने उनसे पूछा कि क्या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करनी चाहिए, तो शास्त्री जी का जवाब ऐतिहासिक था - "आगे बढ़िए, देश आपके साथ है।" इस एक फैसले ने युद्ध के हर समीकरण को बदल दिया। देश की जनता भी इस दौरान पूरी तरह से एकजुट थी और सैनिकों के साथ खड़ी थी।

निष्कर्ष

साल 1965 के युद्ध की 6-7 सितंबर की वह रात भारत की सामरिक शक्ति, अनुशासन और रणनीतिक दक्षता का एक अनूठा उदाहरण है। इस एक रात के फैसलों और सैन्य पराक्रम ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सेना किसी भी परिस्थिति में अपने देश की संप्रभुता की रक्षा करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। यह रात न केवल युद्ध का रुख मोड़ने के लिए याद की जाती है, बल्कि यह हमारे वीर जवानों के अदम्य साहस की अमर गाथा भी है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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