इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act के तहत किसी मामले को विशेष अदालत में भेजने से पहले यदि मजिस्ट्रेट उसका संज्ञान ले लेते हैं, तो इससे पूरी आपराधिक कार्यवाही अमान्य (Vitiate) नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि शुरुआती स्तर पर प्रक्रियागत अनियमितता होने मात्र से बाद के आदेशों को रद्द नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने अजय यादव व दो अन्य लोगों द्वारा दायर की गई आपराधिक अपील को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। अपीलकर्ताओं ने बलिया की SC/ST Act विशेष अदालत के जज द्वारा 22 मई 2019 को जारी किए गए समनिंग ऑर्डर (पेश होने के आदेश) को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई शुरुआती कार्यवाही से उनके किसी मौलिक अधिकार का हनन हुआ है या न्याय प्रक्रिया में कोई बाधा आई है।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
यह पूरा मामला एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति द्वारा एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) के समक्ष दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी लाठी-डंडे लेकर पीड़ित के घर पहुंचे, उसे जातिसूचक गालियां दीं, मारपीट की और धमकी दी कि उसे गांव में रहने नहीं दिया जाएगा। बीच-बचाव करने आई पीड़ित की पत्नी के साथ भी मारपीट और अभद्रता करने तथा उसे निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाने की धमकी देने का आरोप था।
संबंधित एसीजेएम ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए CrPC की धारा 200 के तहत शिकायतकर्ता और धारा 202 के तहत उसकी पत्नी का बयान दर्ज किया। इसके बाद जिला एवं सेशंस जज के आदेश से इस मामले को सुनवाई के लिए विशेष SC/ST अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया। आरोपियों ने इसी प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि SC/ST Act की धारा 2(bd) और 14 के प्रावधानों के तहत मजिस्ट्रेट के स्तर पर की गई कार्यवाही कानून सम्मत नहीं है और इसके बाद जारी समनिंग ऑर्डर भी वैध नहीं है।
हाईकोर्ट की कानूनी व्याख्या और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट की धारा 14 में साल 2016 हुए संशोधन का जिक्र करते हुए कहा कि इसके तहत विशेष अदालत को यह अधिकार मिल गया है कि वह मजिस्ट्रेट द्वारा मामला सौंपे जाने की अनिवार्यता के बिना सीधे संज्ञान ले सकती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि मजिस्ट्रेट द्वारा उठाए गए किसी भी पूर्व प्रक्रियागत कदम से बाद की पूरी कार्यवाही स्वतः शून्य हो जाएगी।
अदालत ने 'शांताबेन भुरभाई भुरिया बनाम आनंद अथाभाई चौधरी (2022)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। साथ ही CrPC की धारा 460 और 461 का विश्लेषण करते हुए बताया कि धारा 460(e) कुछ ऐसी स्थितियों में सुरक्षा प्रदान करती है जहां कोई मजिस्ट्रेट नेक नीयत से गलती से संज्ञान ले ले, बशर्ते कानूनी शर्तें पूरी हों।
समनिंग चरण में 'मिनी-ट्रायल' की आवश्यकता नहीं
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि समनिंग या तलब करने के चरण में हर आरोप की सत्यता को परखने या गवाहों की विश्वसनीयता तौलने के लिए किसी प्रकार का 'मिनी-ट्रायल' करने की आवश्यकता नहीं होती। विशेष जज ने मामला ट्रांसफर होने के बाद रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन किया था। अपीलकर्ताओं की ओर से कोई ऐसी असाध्य अवैधता नहीं दिखाई गई, जिससे हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़े।
इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि यदि उन्होंने अभी तक जमानत नहीं ली है, तो वे दो सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में पेश होकर नियमित जमानत के लिए आवेदन करें।