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मराठी न जानने वाले ऑटो चालकों की बढ़ी मुश्किलें, नागपुर आरटीओ ने थमाया नोटिस

मराठी न जानने वाले ऑटो चालकों की बढ़ी मुश्किलें, नागपुर आरटीओ ने थमाया नोटिस

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों की सुविधा और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का असर अब मैदानी स्तर पर दिखने लगा है। नागपुर में प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (आरटीओ) द्वारा ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए शुरू की गई व्यावहारिक मराठी भाषा की मौखिक परीक्षा में शुरुआती आंकड़े सामने आ चुके हैं। इस सख्ती के बीच पहले दो दिनों में ही कुछ चालकों को झटका लगा है, जिन्हें अब भाषा सीखने के लिए कड़ा निर्देश दिया गया है।

दो दिनों में 350 में से 17 चालक हुए अनुत्तीर्ण

नागपुर शहर, पूर्व नागपुर और नागपुर ग्रामीण आरटीओ क्षेत्रों में पिछले दो दिनों के भीतर कुल 350 ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों की भाषा परीक्षा ली गई। इस दौरान परिवहन विभाग के अधिकारियों ने पाया कि अधिकांश पुराने और स्थानीय चालक आसानी से मराठी समझ और बोल लेते हैं। हालांकि, इनमें से 17 चालक व्यावहारिक मराठी के बुनियादी सवालों के जवाब देने में विफल रहे।

नियमों का पालन न करने और मौखिक परीक्षा में फेल होने वाले इन 17 चालकों को आरटीओ प्रशासन की ओर से आधिकारिक तौर पर नोटिस जारी कर दिया गया है। विभाग ने इन सभी चालकों को अपनी भाषा कौशल को सुधारने के लिए ठीक एक महीने का समय (मोहल्लत) दिया है।

क्यों अनिवार्य की गई है मराठी भाषा?

परिवहन विभाग के अनुसार, इस नए नियम को लागू करने के पीछे कई व्यावहारिक और जनहित से जुड़े कारण हैं:

  • सुगम संवाद: अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बाहरी राज्यों से आने वाले चालक स्थानीय यात्रियों की बात ठीक से समझ नहीं पाते, जिससे भ्रम की स्थिति बनती है।
  • गंतव्य की स्पष्टता: नागपुर के स्थानीय इलाकों, रास्तों और ऐतिहासिक स्थलों के नाम समझने में भाषा की कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।
  • यात्री सुरक्षा: आपातकालीन परिस्थितियों या दुर्घटना के समय चालक और यात्री के बीच संवाद बेहद महत्वपूर्ण होता है।
  • आधिकारिक भाषा का सम्मान: महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा मराठी को सार्वजनिक सेवाओं में और अधिक प्रभावी बनाना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है।

क्या कहता है आरटीओ का अगला कदम?

परिवहन अधिकारियों ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि यह नोटिस केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक अवसर है। यदि कोई चालक एक महीने की मोहलत खत्म होने के बाद भी व्यावहारिक मराठी सीखने में असमर्थ रहता है या लापरवाही बरतता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। ऐसे चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस और कमर्शियल बैज को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

यूनियन ने उठाए सवाल: 'क्या सिर्फ गरीब चालक ही निशाना?'

भले ही प्रशासन इस नियम को यात्रियों की सुरक्षा और सहूलियत से जोड़ रहा हो, लेकिन मजदूर संगठनों और ऑटो यूनियनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विदर्भ ऑटो-रिक्शा फेडरेशन के अध्यक्ष और महाराष्ट्र ऑटो रिक्शा चालक-मालिक संयुक्त कृति समिति के महासचिव विलास भालेकर ने इस कार्रवाई को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है।

"ऑटो चालकों के सामने आज आजीविका और रोजी-रोटी से जुड़े कई गंभीर संकट हैं। इन्हें हल करने के बजाय परिवहन मंत्री केवल इस तरह की स्टंटबाजी कर रहे हैं। अगर सरकार चाहती है कि चालक मराठी सीखें, तो उन्होंने इसके लिए अब तक कितनी मुफ्त प्रशिक्षण कक्षाएं (ट्रेनिंग क्लासेज) शुरू की हैं? केवल गरीब ऑटो चालकों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? ओला, उबर और रैपिडो जैसी बड़ी कैब एग्रीगेटर कंपनियों के चालकों पर ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखती?"
— विलास भालेकर, महासचिव, संयुक्त कृति समिति

नागपुर और मुंबई की स्थिति में अंतर

आरंभिक रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई जैसे महानगरों की तुलना में नागपुर में मराठी न जानने वाले चालकों का प्रतिशत काफी कम है। नागपुर में बाहरी राज्यों से आकर बसने वाले कई चालक वर्षों से यहां रह रहे हैं, जिसके कारण वे स्थानीय भाषा से पूरी तरह वाकिफ हैं। वर्तमान में जो दिक्कतें सामने आ रही हैं, वे मुख्य रूप से उन नए चालकों के साथ हैं जो हाल ही में इस पेशे से जुड़े हैं या हाल ही में शहर में आए हैं।

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अल्का सिंह

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Senior Content Writer

अल्का सिंह स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषयों पर गहन शोध के साथ लेखन करती हैं। उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को केवल सामान्य जानकारी ही नहीं, बल...

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