भारतीय राजनीति के गलियारों में पिछले कई महीनों से सुगबुगाहट का केंद्र बनी सोनिया गांधी की आत्मकथा को लेकर आखिरकार स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है। पेंगुइन इंडिया के साथ उपजे कथित विवाद और संपादकीय बदलावों की लंबी खींचतान के बाद, इस बहुप्रतीक्षित संस्मरण के प्रकाशन की जिम्मेदारी अब 'हार्पर कॉलिन्स इंडिया' ने उठा ली है। प्रकाशक की ओर से दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस किताब का भव्य वैश्विक विमोचन आगामी 10 नवंबर को किया जाएगा।
विवादों के बाद बदला प्रकाशक, हार्पर कॉलिन्स ने संभाली कमान
सोनिया गांधी जैसी वरिष्ठ और प्रभावशाली राजनेत्री के संस्मरण का आना अपने आप में एक ऐतिहासिक साहित्यिक घटना है। शुरुआती दौर में इस किताब के प्रकाशन के लिए पेंगुइन इंडिया के साथ अनुबंध की चर्चाएं थीं। हालांकि, अंदरखाने चल रहे घटनाक्रम, संपादकीय बदलावों की मांगों और अचानक खड़े हुए राजनीतिक तर्कों के चलते पेंगुइन ने इस प्रोजेक्ट से पीछे हटने का फैसला किया। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक और साहित्यिक हलकों में खासी हलचल पैदा कर दी थी।
लेकिन अब सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने इस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर ले लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि इस किताब के बाजार में आने से भारतीय राजनीति के कई अनछुए पहलुओं पर से पर्दा उठ सकता है, खासकर कांग्रेस पार्टी के भीतर के दशकों के सफर और महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों के संदर्भ में।
क्या होगा इस संस्मरण में खास?
सोनिया गांधी का जीवन किसी खुली किताब की तरह रहा है, लेकिन इसके बावजूद उनके निजी संस्मरणों, विचारों और अनुभवों को पहली बार आधिकारिक तौर पर पन्नों पर उतारा जा रहा है। इटली में एक साधारण परिवार में जन्म लेने से लेकर, देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार का हिस्सा बनने और अंततः देश की सबसे पुरानी पार्टी की कमान संभालने तक का उनका सफर बेहद रोमांचक रहा है।
- व्यक्तिगत से राजनीतिक जीवन तक: राजीव गांधी के साथ उनका विवाह, उनकी राजनीतिक में अनिच्छुक एंट्री और फिर देश की राजनीति की धुरी बनने तक की कहानी।
- ऐतिहासिक फैसले: यूपीए सरकार के गठन, साल 2004 और 2009 के चुनावों में जीत और कई राष्ट्रीय संकटों के दौरान लिए गए फैसलों के पीछे की अंदरूनी दास्तान।
- परिवार और संघर्ष: इंदिरा गांधी की हत्या का वह खौफनाक दौर, पति और सास की असमय मौत का व्यक्तिगत आघात और एक मां के रूप में अपने बच्चों को पालने का संघर्ष।
राजनीतिक गलियारों में क्यों है इतनी सुगबुगाहट?
जब भी देश का कोई शीर्ष राजनेता अपनी आत्मकथा लिखता है, तो राजनीतिक दलों की धड़कनें तेज होना लाजिमी है। सोनिया गांधी के मामले में यह उत्सुकता और भी अधिक है क्योंकि उन्होंने भारतीय राजनीति के सबसे संवेदनशील दौर को बहुत करीब से देखा और चलाया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह किताब आगामी चुनावों और राजनीतिक बहसों पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है। विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष तक, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि संस्मरण में किन-किन राजनीतिक घटनाओं और चेहरों का जिक्र खुलकर किया गया है।
प्रकाशन की राह में थीं कई अड़चनें
शुरुआती दौर में यह प्रोजेक्ट विवादों के घेरे में आ गया था। संपादकीय स्वतंत्रता और कुछ संवेदनशील राजनीतिक अध्यायों को लेकर प्रकाशक और लेखक के बीच कथित मतभेदों की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनी थीं। पेंगुइन इंडिया के पीछे हटने के बाद यह सवालिया निशान लग गया था कि क्या यह किताब कभी पाठकों तक पहुंच भी पाएगी या नहीं। हालांकि, हार्पर कॉलिन्स के इस प्रोजेक्ट को अपने हाथ में लेने के बाद तमाम अटकलों पर विराम लग गया है और अब तय समय यानी 10 नवंबर को यह वैश्विक मंच पर उपलब्ध होगी।
पाठकों और साहित्य प्रेमियों में जबरदस्त उत्साह
राजनीतिक किताबों के शौकीनों के लिए यह साल का सबसे बड़ा साहित्यिक लॉन्च साबित हो सकता है। भारत के अलावा दुनिया भर के कई देशों में इस किताब के अंग्रेजी संस्करण के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी इसके अनुवाद की मांग की जा रही है। विशेष तौर पर हिंदी पाठकों के बीच इसे लेकर भारी उत्सुकता देखी जा रही है।
अब देखना यह होगा कि 10 नवंबर को जब यह संस्मरण आधिकारिक तौर पर पाठकों के हाथों में पहुंचेगा, तो यह भारतीय राजनीति और इतिहास के पन्नों में किस तरह की नई बहसों को जन्म देता है। फिलहाल, प्रकाशक और लेखक दोनों के स्तर पर इस मेगा लॉन्च की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।