देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन से जुड़े विवाद ने अब देश की सबसे बड़ी अदालत में तूल पकड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ जहां स्टूडेंट लीडर अक्षत त्रिपाठी को नोटिस भेजने के मामले में गाज गिरी है, वहीं दूसरी तरफ एक मासूम बच्ची को डराने-धमकाने और उसके परिवार को प्रताड़ित करने के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। शीर्ष अदालत की इस सख्त कार्रवाई के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
अक्षत त्रिपाठी नोटिस विवाद और मजिस्ट्रेट पर एक्शन
जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े इस चर्चित मामले में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के नेता अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी करने वाले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को आखिरकार निलंबित कर दिया गया है। इस बात की औपचारिक जानकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच को दी। कोर्ट ने इस कार्रवाई पर संज्ञान लेते हुए साफ कर दिया है कि कानून के रखवाले यदि इस तरह की मनमानी करेंगे, तो अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेगी।
एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी और पूछा था कि आखिर किस आधार पर इस तरह के नोटिस जारी किए जा रहे हैं। अदालत की सख्ती के बाद प्रशासनिक मशीनरी हरकत में आई और तुरंत कार्रवाई करते हुए संबंधित मजिस्ट्रेट को सस्पेंड करने का कदम उठाया गया।
मासूम बच्ची को डराने पर भड़के CJI सूर्यकांत
यह पूरा विवाद केवल एक नोटिस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें जंतर-मंतर पर हुए एक हिंसक प्रदर्शन से जुड़ी हैं। 'कॉकरोच जनता पार्टी' के बैनर तले हुए एक प्रदर्शन के दौरान एक बच्ची के पिता का सिर फोड़ दिया गया था। इस मामले में मुख्य आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को हालांकि जेल भेज दिया गया है, लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ, उसने न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक मासूम बच्ची को डराया जा रहा है और अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। सीजेआई ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह के रवैये को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने माना कि यदि न्याय मांगने वालों को ही डराया-धमकाया जाएगा, तो आम नागरिक का तंत्र से भरोसा उठ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश और रिपोर्ट तलब
गुरुवार को लगातार दूसरे दिन केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों को आड़े हाथों लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम निर्देश जारी किए। बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को स्पष्ट निर्देश दिए कि:
- पीड़ित बच्ची की एफआईआर पर तुरंत और प्रभावी कार्रवाई की जाए।
- उत्तर प्रदेश और दिल्ली पुलिस यह सुनिश्चित करें कि पीड़ित परिवार को पूरी सुरक्षा मिले।
- मामले में अब तक की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की जाए।
- यदि किसी नाबालिग को न्याय पाने से रोकने या प्रताड़ित करने की कोशिश की गई है, तो संलिप्त अधिकारियों और तत्वों पर तुरंत शिकंजा कसा जाए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी सॉलिसिटर जनरल से कहा कि अदालत यह चाहती है कि पुलिस बिना किसी हीला-हवाली के तुरंत एक्शन ले और यूपी पुलिस यह सुनिश्चित करे कि पीड़ित परिवार को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।
घर पर तोड़फोड़ और वकीलों के गंभीर आरोप
अदालत में सुनवाई के दौरान बच्ची की तरफ से पेश हुए वकील ने बहुत ही चौंकाने वाले खुलासे किए। वकील ने अदालत को बताया कि उस बच्ची ने एक वीडियो सामने आने के बाद प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें एक व्यक्ति ने खुलेआम यह दावा किया था कि उसने जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान लड़की के पिता पर हमला किया था।
वकील ने आरोप लगाया कि इस खुलासे के बाद से लड़की को लगातार परेशान किया जाने लगा। हद तो तब हो गई जब उनके घर में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई और पथराव किया गया। इसके तमाम वीडियो सबूत भी मौजूद हैं। वकील ने अदालत को बताया कि जिन लोगों ने खुलेआम इस हमले को अंजाम दिया और कैमरे में रिकॉर्ड हुए, उन पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टा बच्ची के खिलाफ ही प्राथमिकी दर्ज कर दी गई।
समिति की जांच लंबी, सुरक्षा प्राथमिकता
पीड़ित पक्ष के वकील ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि इस मामले की जांच के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया है, लेकिन इस तरह की समितियों की जांच रिपोर्ट आने में लंबा समय लग सकता है। वकील ने चिंता जताई कि यदि इस बीच बच्ची या उसके परिवार के साथ कोई अनहोनी या बड़ी घटना हो जाती है, तो उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती। इसलिए प्रशासनिक जांच से ज्यादा जरूरी इस वक्त परिवार की सुरक्षा और आरोपियों की गिरफ्तारी है।
प्रशासनिक हलकों में मचा हड़कंप
सुप्रीम कोर्ट के इस आक्रामक और सख्त रुख के बाद दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस के उच्च अधिकारियों में खलबली मच गई है। जिस प्रकार से सर्वोच्च अदालत ने खुद इस मामले की मॉनिटरिंग करने के संकेत दिए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े प्रशासनिक फेरबदल या गाज गिर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंतर-मंतर की यह घटना और उसके बाद जिस तरह से एक नाबालिग बच्ची को निशाना बनाया गया, उसने देश की कानून-व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इन कड़े निर्देशों के बाद पुलिस प्रशासन कितनी तेजी से आरोपियों को शिकंजे में कसता है और पीड़ित परिवार को भयमुक्त माहौल दे पाता है। देश की निगाहें अब इस मामले में अगली सुनवाई और पुलिस रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।