पारंपरिक बंगाली रसोई में आधुनिक मिक्सर-ग्राइंडर और पारंपरिक शील-नोरा (सिल-बट्टा) की तुलना अक्सर की जाती है। जहां मिक्सर समय और मेहनत बचाता है, वहीं शील-नोरा से बने बंगाली व्यंजनों का स्वाद पूरी तरह अलग होता है।
आधुनिक बंगाली रसोइयों में मिक्सर-ग्राइंडर एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। मसाले पीसने से लेकर शर्सिए इलिश के लिए राई का पेस्ट तैयार करने, आलू पोस्तो के लिए पोस्तो बाटा बनाने या दाल की स्वादिष्ट पकौड़ियां (बोरान) तैयार करने के लिए मिक्सी का उपयोग आम है। हालांकि, पारंपरिक शील-नोरा यानी समतल पत्थर और उसके हाथ के बेलनाकार रोलर से तैयार खाने के स्वाद की बात ही कुछ और है।
स्वाद में अंतर केवल पुरानी यादें नहीं, बल्कि विज्ञान है
कुकरी कॉलमिस्ट और लेखिका रुक्मा दक्ष का कहना है कि राई का पेस्ट अधिक तीखा और संतुलित स्वाद देता है, पोस्तो (खसखस) की बनावट मलाईदार होती है, और दाल की पकौड़ी अंदर से बेहद नरम बनती है। इसके अलावा, साधारण बंगाली भोरता में भी एक ऐसी गहराई आती है जिसे मशीन से आसानी से नहीं दोहराया जा सकता।
रुक्मा दक्ष के अनुसार, यह केवल पुरानी यादों का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामग्री को पीसने का वैज्ञानिक तरीका और उससे निकलने वाले प्राकृतिक तेल हैं।
मिक्सी और शील-नोरा की कार्यप्रणाली में अंतर
मिक्सी तेजी से घूमने वाले ब्लेड पर काम करती है जो सामग्री को काटकर छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं। इसके विपरीत, शील-नोरा पत्थर की सतह पर निरंतर दबाव और घर्षण के जरिए सामग्री को कुचलता और रगड़ता है। यह क्रमिक पिसाई प्राकृतिक तेलों, रसों और सुगंधित यौगिकों को बाहर निकालने में मदद करती है, साथ ही रसोइया को पेस्ट की मोटाई और बनावट पर पूरा नियंत्रण देती है।
पोस्तो और राई के पेस्ट पर प्रभाव
पारंपरिक बंगाली कुकिंग में बनावट (टेक्सचर) का बहुत महत्व होता है। उदाहरण के लिए, पोस्तो बाटा में खसखस के प्राकृतिक तेल इसके समृद्ध, नटी स्वाद और मलाईदार रूप में योगदान करते हैं। शील-नोरा पर पीसने से बिना ज्यादा पानी मिलाए एक गाढ़ा और एकजुट पेस्ट तैयार होता है। मिक्सी में कम मात्रा होने पर पोस्तो जार में घूम सकता है, जिससे दानेदार बनावट रह सकती है या अतिरिक्त पानी की आवश्यकता पड़ सकती है।
यही नियम राई के पेस्ट पर भी लागू होता है। जब राई के दानों को कुचला जाता है, तो मायरोसिनेस नामक एंजाइम तीखेपन के लिए जिम्मेदार यौगिकों को छोड़ता है। शील-नोरा इसे क्रमिक रूप से कुचलने की अनुमति देता है। इसके विपरीत, मिक्सी का लंबे समय तक हाई-स्पीड चलना मिश्रण को गर्म कर सकता है और उसकी नाज़ुक खुशबू को प्रभावित कर सकता है।
भोरता और दाल की पकोड़ियों में विशिष्टता
बैंगन पोड़ा, टमाटर भोरता या सादे आलू भोरता में पारंपरिक विधि सामग्री को पूरी तरह प्यूरी बनाए बिना मिलाने में मदद करती है। प्याज, हरी मिर्च और भुनी हुई सब्जियों के छोटे टुकड़े अपना अलग चरित्र बनाए रखते हैं, जबकि उनके रस और तेल आपस में खूबसूरती से घुलमिल जाते हैं।
इसी प्रकार, भिगोई हुई दाल को धीरे-धीरे पीसने से उसमें हल्का खुरदरापन बना रहता है, जिससे ऐसी बोरान (पकौड़ियां) बनती हैं जो बाहर से कुरकुरी और अंदर से नरम होती हैं। मिक्सी कई बार दाल को बहुत बारीक पीस देती है या ज्यादा पानी मांगती है, जिससे बैटर ढीला हो जाता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि मिक्सर का उपयोग पूरी तरह वर्जित है। छोटे बैचों, न्यूनतम पानी और निरंतर पिसाई के बजाय छोटे पल्स का उपयोग करके मिक्सी में भी अच्छे पेस्ट बनाए जा सकते हैं। अंतर केवल इतना है कि शील-नोरा रसोइया को हर चरण में सामग्री को महसूस करने और उसकी बनावट का आकलन करने की अनुमति देता है।